Indian Cinema: 15 अगस्त 1947 को देश को आजाद हुए 80 साल हो गए हैं. ये आजादी सिर्फ देश के इतिहास में एक बड़ा मोड़ नहीं थी बल्कि इसने भारतीय सिनेमा की दिशा को भी बदल दिया, जैसे-जैसे देश में सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक हालात बदले, वैसे-वैसे फिल्मों की कहानियां, किरदार और उन्हें पेश करने का अंदाज भी बदलता गया. सिनेमा ने कभी गरीबी में संघर्ष करते लोगों की कहानी दिखाई गई, तो कभी बेरोजगारी और भ्रष्टाचार का मुद्दा उठाया गया. 80 सालों में सिनेमा ब्लैक एंड व्हाइट से ओटीटी तक पहुंच गया है.
कहां से शुरू हुआ फिल्मों का सफर
भारत में सिनेमा की शुरुआत 19वीं सदी में हुई थी. इसके बाद दादासाहेब फाल्के ने 1913 में ‘राजा हरिश्चंद्र’ बनाकर भारतीय फीचर फिल्म इंडस्ट्री की मजबूत नींव रखी. उस समय पर मूक फिल्में बनाई जाती थीं, जिनमें आवाज नहीं होती थी. उस दौर में कहानियां भारतीय संस्कृति और पौराणिक कथाओं से जुड़ी थीं. 1931 में ‘आलम आरा’ के साथ भारतीय सिनेमा में बोलती फिल्मों का दौर शुरू हुआ. इसके बाद आवाज और संगीत का चलन बढ़ा और फिल्मों का असर तेजी से बढ़ने लगा. ये गाने ही भारतीय फिल्मों की पहचान बनते चले गए.
आजादी के बाद का सिनेमा
1947 में देश आजाद हुआ तो भारत के सामने गरीबी, बेरोजगारी, विस्थापन और सामाजिक असमानताओं जैसी चुनौतियां मुंह फैलाए खड़ी थीं. उस दौर का सिनेमा भी इन समस्याओं से अछूता नहीं रहा. उस दौर के एक्टर्स ने इन मुद्दों को कहानियों में बखूबी दिखाया. राज कपूर, गुरु दत्त, बिमल रॉय और महबूब खान जैसे एक्टर्स ने आम आदमी की जिंदगी को अपनी फिल्मों का हिस्सा बनाया. उस दौर में ‘मदर इंडिया’, ‘आवारा’, ‘श्री 420’, ‘प्यासा’, ‘दो बीघा जमीन’ और ‘मदर इंडिया’ जैसी तमाम फिल्में आईं. इनमें मनोरंजन के साथ समाज की हकीकत दिखाई गई.
70 के दशक में क्या बदला?
70 के दशक में आर्थिक और सामाजिक उथल-पुथल का दौर था. उस समय पर युवा बेरोजगारी, महंगाई और भ्रष्टाचार से परेशान थे. इसकी नाराजगी 70 के दशक में फिल्मों में दिखी. इसी दौर में अमिताभ बच्चन ‘एंग्री यंग मैन’ बनकर उभरे. वे जंजीर, दीवार और शोले में व्यवस्था से लड़ते नजर आए. इसी दौरान मसाला फिल्मों का दौर मजबूत हुआ. इन फिल्मों में एक्शन, रोमांस, कॉमेडी और ड्रामा नजर आया.
90 के दशक में फिल्मों की कहानियां
90 के दशक में फिल्मों की कहानियां आर्थिक उदारीकरण पर थीं. फिल्मों में भी इसका अअसर दिखा. शाहरुख खान, सलमान खान और आमिर खान जैसे सितारे नई पीढ़ी के पसंदीदा चेहरे बनने लगे. इसी दौर में रोमांस की कहानियों ने भी फिल्मों में जगह बनाई.
2000 के बाद फिर बदला कहानियों का दौर
नई सदी में डिजिटल तकनीक, बेहतर VFX और नए तरह के विषयों ने सिनेमा को बदला. इस दौरान ‘लगान’, ‘दिल चाहता है’, ‘स्वदेस’ और ‘रंग दे बसंती’ जैसी फिल्मों ने मनोरंजन के साथ सामाजिक और राष्ट्रीय मुद्दों को भी नए अंदाज में पेश किया. इसके बाद क्षेत्रीय सिनेमा की लोकप्रियता भी तेजी से बढ़ी. ‘बाहुबली’, ‘KGF’, ‘RRR’, ‘पुष्पा’ और ‘कांतारा’ जैसी फिल्मों ने भाषा की सीमाओं को पार करते हुए पूरे देश में अलग पहचान बनाई. पैन-इंडिया सिनेमा भारतीय फिल्म इंडस्ट्री की नई ताकत बनकर सामने आया.
ओटीटी ने बढ़ाए ऑप्शन
कोरोना महामारी के बाद OTT प्लेटफॉर्म का चलन तेजी से बढ़ा. दर्शकों के पास फिल्मों के अलावा वेब सीरीज और अलग-अलग भाषाओं की कहानियों के ऑप्शन आए. छोटे बजट की फिल्में और नए कलाकार भी ज्यादा ऑडियंस तक पहुंची. यहां शॉर्ट फिल्म से लेकर फिल्म और वेब सीरीज तक लोगों के ऑप्शन में शामिल हुए.
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