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Ex Justice Yashwant Varma: कैश कांड में घिरे पूर्व जज यशवंत वर्मा: जांच समिति ने खारिज किए तर्क, सभी आरोप सही! जानिए क्या है पूरा मामला

Justice Yashwant Varma News In Hindi: कैश कांड में इलाहाबाद HC के पूर्व जस्टिस यशवंत वर्मा पर जाँच समिति का शिकंजा, सबूतों से छेड़छाड़ के आरोप सिद्ध. जानिए क्या है पूरा मामला.

Written By:
Edited By: Uttam Ojha
Last Updated: 2026-08-12 18:25:03

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Justice Yashwant Varma News In Hindi: इलाहाबाद उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस यशवंत वर्मा के दिल्ली स्थित सरकारी आवास से बरामद बेहिसाब नकदी मामले में लोकसभा की जाँच समिति ने अपनी अंतिम रिपोर्ट प्रस्तुत कर दी है. समिति ने उनके खिलाफ लगाए गए तीनों प्राथमिक आरोपों को पूरी तरह सिद्ध माना है.

लाइव लॉ की रिपोर्ट के अनुसार, लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला द्वारा गठित तीन सदस्यीय न्यायाधीश जाँच समिति ने न्यायमूर्ति वर्मा द्वारा दिए गए स्पष्टीकरणों को ‘टालमटोल वाला, अधूरा और भ्रामक’ करार दिया है.

क्या था पूरा मामला?

यह पूरा विवाद 14-15 मार्च 2025 की दरम्यानी रात का है. उस समय यशवंत वर्मा दिल्ली उच्च न्यायालय के जज के रूप में कार्यरत थे. नई दिल्ली स्थित उनके आधिकारिक आवास के स्टोर रूम में देर रात अचानक आग लग गई. आग बुझाने के बाद जब अधिकारियों ने निरीक्षण किया, तो वहाँ से ₹500 के जले और अधजले नोटों की बड़ी खेप बरामद हुई. घटना के कुछ समय बाद जलते हुए नोटों और अधजली करेंसी का एक वीडियो भी सामने आया था, जिसने न्यायिक हलकों में हड़कंप मचा दिया था. हालांकि, जस्टिस वर्मा ने शुरुआत से ही इन आरोपों को खारिज करते हुए इसे अपने खिलाफ एक रची गई साजिश बताया था.

कैसे शुरू हुई जाँच प्रक्रिया?

मामला गरमाने के बाद तत्कालीन भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) के निर्देश पर एक आंतरिक जाँच कराई गई. इसमें प्रतिकूल निष्कर्ष आने पर लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने न्यायाधीश (जाँच) अधिनियम के तहत तीन सदस्यीय समिति गठित की.

इस समिति की अध्यक्षता उच्चतम न्यायालय के न्यायमूर्ति अरविंद कुमार ने की. समिति के गठन के लिए विभिन्न राजनीतिक दलों के सांसदों ने संयुक्त रूप से प्रस्ताव का समर्थन किया था.

जाँच समिति के 3 मुख्य निष्कर्ष

जाँच समिति ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट किया है कि भले ही प्रक्रियात्मक चूक हुई हों, लेकिन उपलब्ध साक्ष्य आरोपों को साबित करने के लिए पर्याप्त हैं:

1. साक्ष्यों के रखरखाव में बड़ी लापरवाही

समिति ने अपनी रिपोर्ट में दर्ज किया कि मौके पर बरामद नकदी को न तो विधिवत जब्त किया गया और न ही उसकी कोई आधिकारिक गिनती या ‘पंचनामा’ तैयार हुआ. इसके बावजूद उपलब्ध भौतिक और डिजिटल साक्ष्य यह साबित करते हैं कि आवास में मौजूद अघोषित नकदी की मात्रा काफी अधिक थी.

2. लगातार बदलते रहे जवाब और तर्क

समिति के अनुसार, न्यायमूर्ति वर्मा के बयान समय-समय पर बदलते रहे. उन्होंने किसी भी तरह की नकदी की जानकारी होने से साफ इनकार किया और कहा कि उनके या उनके परिवार/कर्मचारियों द्वारा कोई नकदी नहीं रखी गई थी.  बाद में उनके बचाव में नकली नोटों की संभावना, नकदी ‘प्लांट’ किए जाने, कर्मचारियों की संलिप्तता और साजिश जैसी दलीलें दी गईं.

साजिश का सबूत नहीं: समिति ने रेखांकित किया कि साजिश या नकदी प्लांट किए जाने को लेकर उनकी तरफ से कोई आधिकारिक शिकायत या एफआईआर दर्ज नहीं कराई गई थी.

3. स्वयं गवाही देने से पीछे हटे

जाँच प्रक्रिया के दौरान जब अभियोजन पक्ष के साक्ष्य पूरे हो गए और बचाव पक्ष की गवाही का समय आया, तब न्यायमूर्ति वर्मा कार्यवाही से अलग हो गए. उन्होंने न तो खुद गवाही दी और न ही अपने परिवार, घरेलू कर्मचारियों या सुरक्षाकर्मियों में से किसी को बचाव पक्ष के गवाह के रूप में पेश किया.

इस्तीफा और आगे की कानूनी स्थिति

जाँच पूरी होने से ठीक पहले ही जस्टिस यशवंत वर्मा ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया था. अब मुख्य सवाल यह उठ रहा है कि क्या संसद इस रिपोर्ट के आधार पर आगे महाभियोग या दंडात्मक कार्रवाई कर सकती है? कानूनी विशेषज्ञों में इसे लेकर दो राय हैं: एक वर्ग का मानना है कि न्यायाधीश (जाँच) अधिनियम का प्रयोग केवल पद पर बने हुए (कार्यरत) न्यायाधीशों के खिलाफ ही किया जा सकता है. वहीं, दूसरे पक्ष का तर्क है कि संस्थागत शुचिता बनाए रखने के लिए अंतिम रिपोर्ट का कानूनी अंजाम तक पहुँचना आवश्यक है.

फिलहाल, रिपोर्ट लोकसभा के पटल पर रखी जा चुकी है और अब गेंद संसद तथा सक्षम प्राधिकारियों के पाले में है कि वे इस पर क्या रुख अपनाते हैं.

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Last Updated: 2026-08-12 18:25:03

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Justice Yashwant Varma News In Hindi: इलाहाबाद उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस यशवंत वर्मा के दिल्ली स्थित सरकारी आवास से बरामद बेहिसाब नकदी मामले में लोकसभा की जाँच समिति ने अपनी अंतिम रिपोर्ट प्रस्तुत कर दी है. समिति ने उनके खिलाफ लगाए गए तीनों प्राथमिक आरोपों को पूरी तरह सिद्ध माना है.

लाइव लॉ की रिपोर्ट के अनुसार, लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला द्वारा गठित तीन सदस्यीय न्यायाधीश जाँच समिति ने न्यायमूर्ति वर्मा द्वारा दिए गए स्पष्टीकरणों को ‘टालमटोल वाला, अधूरा और भ्रामक’ करार दिया है.

क्या था पूरा मामला?

यह पूरा विवाद 14-15 मार्च 2025 की दरम्यानी रात का है. उस समय यशवंत वर्मा दिल्ली उच्च न्यायालय के जज के रूप में कार्यरत थे. नई दिल्ली स्थित उनके आधिकारिक आवास के स्टोर रूम में देर रात अचानक आग लग गई. आग बुझाने के बाद जब अधिकारियों ने निरीक्षण किया, तो वहाँ से ₹500 के जले और अधजले नोटों की बड़ी खेप बरामद हुई. घटना के कुछ समय बाद जलते हुए नोटों और अधजली करेंसी का एक वीडियो भी सामने आया था, जिसने न्यायिक हलकों में हड़कंप मचा दिया था. हालांकि, जस्टिस वर्मा ने शुरुआत से ही इन आरोपों को खारिज करते हुए इसे अपने खिलाफ एक रची गई साजिश बताया था.

कैसे शुरू हुई जाँच प्रक्रिया?

मामला गरमाने के बाद तत्कालीन भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) के निर्देश पर एक आंतरिक जाँच कराई गई. इसमें प्रतिकूल निष्कर्ष आने पर लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने न्यायाधीश (जाँच) अधिनियम के तहत तीन सदस्यीय समिति गठित की.

इस समिति की अध्यक्षता उच्चतम न्यायालय के न्यायमूर्ति अरविंद कुमार ने की. समिति के गठन के लिए विभिन्न राजनीतिक दलों के सांसदों ने संयुक्त रूप से प्रस्ताव का समर्थन किया था.

जाँच समिति के 3 मुख्य निष्कर्ष

जाँच समिति ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट किया है कि भले ही प्रक्रियात्मक चूक हुई हों, लेकिन उपलब्ध साक्ष्य आरोपों को साबित करने के लिए पर्याप्त हैं:

1. साक्ष्यों के रखरखाव में बड़ी लापरवाही

समिति ने अपनी रिपोर्ट में दर्ज किया कि मौके पर बरामद नकदी को न तो विधिवत जब्त किया गया और न ही उसकी कोई आधिकारिक गिनती या ‘पंचनामा’ तैयार हुआ. इसके बावजूद उपलब्ध भौतिक और डिजिटल साक्ष्य यह साबित करते हैं कि आवास में मौजूद अघोषित नकदी की मात्रा काफी अधिक थी.

2. लगातार बदलते रहे जवाब और तर्क

समिति के अनुसार, न्यायमूर्ति वर्मा के बयान समय-समय पर बदलते रहे. उन्होंने किसी भी तरह की नकदी की जानकारी होने से साफ इनकार किया और कहा कि उनके या उनके परिवार/कर्मचारियों द्वारा कोई नकदी नहीं रखी गई थी.  बाद में उनके बचाव में नकली नोटों की संभावना, नकदी ‘प्लांट’ किए जाने, कर्मचारियों की संलिप्तता और साजिश जैसी दलीलें दी गईं.

साजिश का सबूत नहीं: समिति ने रेखांकित किया कि साजिश या नकदी प्लांट किए जाने को लेकर उनकी तरफ से कोई आधिकारिक शिकायत या एफआईआर दर्ज नहीं कराई गई थी.

3. स्वयं गवाही देने से पीछे हटे

जाँच प्रक्रिया के दौरान जब अभियोजन पक्ष के साक्ष्य पूरे हो गए और बचाव पक्ष की गवाही का समय आया, तब न्यायमूर्ति वर्मा कार्यवाही से अलग हो गए. उन्होंने न तो खुद गवाही दी और न ही अपने परिवार, घरेलू कर्मचारियों या सुरक्षाकर्मियों में से किसी को बचाव पक्ष के गवाह के रूप में पेश किया.

इस्तीफा और आगे की कानूनी स्थिति

जाँच पूरी होने से ठीक पहले ही जस्टिस यशवंत वर्मा ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया था. अब मुख्य सवाल यह उठ रहा है कि क्या संसद इस रिपोर्ट के आधार पर आगे महाभियोग या दंडात्मक कार्रवाई कर सकती है? कानूनी विशेषज्ञों में इसे लेकर दो राय हैं: एक वर्ग का मानना है कि न्यायाधीश (जाँच) अधिनियम का प्रयोग केवल पद पर बने हुए (कार्यरत) न्यायाधीशों के खिलाफ ही किया जा सकता है. वहीं, दूसरे पक्ष का तर्क है कि संस्थागत शुचिता बनाए रखने के लिए अंतिम रिपोर्ट का कानूनी अंजाम तक पहुँचना आवश्यक है.

फिलहाल, रिपोर्ट लोकसभा के पटल पर रखी जा चुकी है और अब गेंद संसद तथा सक्षम प्राधिकारियों के पाले में है कि वे इस पर क्या रुख अपनाते हैं.

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