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जमीयत उलेमा-ए-हिंद क्या है, अरशद मदनी से कनेक्शन, वंदे मातरम पर फैसले का विरोध, जानें पूरी कहानी?

Arshad Madani: जमीयत उलेमा-ए-हिंद के प्रेसिडेंट अरशद मदनी ने केंद्र सरकार के उस फैसले की कड़ी आलोचना की जिसमें स्कूलों, कॉलेजों और सरकारी कार्यक्रमों में राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम’ के सभी छह छंदों को जरूरी बनाया गया है. कौन हैं मदनी?

Arshad Madani: जमीयत उलेमा-ए-हिंद के प्रेसिडेंट अरशद मदनी ने को केंद्र सरकार के उस फैसले की कड़ी आलोचना की जिसमें स्कूलों, कॉलेजों और सरकारी कार्यक्रमों में राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम’ के सभी छह छंदों को जरूरी बनाया गया है. उन्होंने कहा कि यह चुनावी राजनीति और सांप्रदायिक एजेंडा को दिखाता है. 

X पर एक पोस्ट में मदनी ने लिखा कि केंद्र सरकार का ‘वंदे मातरम’ को राष्ट्रीय गीत बनाने और सभी सरकारी कार्यक्रमों, स्कूलों, कॉलेजों और कार्यक्रमों में इसके सभी छंदों को जरूरी बनाने का एकतरफ़ा फैसला है. यह जबरदस्ती वाला फैसला न केवल भारत के संविधान द्वारा दी गई धार्मिक स्वतंत्रता पर एक खुला हमला है, बल्कि अल्पसंख्यकों के संवैधानिक अधिकारों को कम करने की एक सिस्टमैटिक कोशिश भी है.

मदनी ने किया विरोध

उन्होंने कहा कि यह कदम एकेश्वरवादी धर्मों की बुनियादी मान्यता के खिलाफ है और किसी मुसलमान को यह गाना गाने के लिए मजबूर करना संविधान के आर्टिकल 25 का साफ उल्लंघन है. मुसलमान किसी को भी ‘वंदे मातरम’ गाने या बजाने से नहीं रोकते. हालांकि, गाने की कुछ लाइनें ऐसी मान्यताओं पर आधारित हैं जो मातृभूमि को एक देवता के रूप में दिखाती हैं, जो एकेश्वरवादी धर्मों की बुनियादी मान्यता के खिलाफ हैं.

चूंकि एक मुसलमान सिर्फ एक अल्लाह की पूजा करता है, इसलिए उसे यह गाना गाने के लिए मजबूर करना संविधान के आर्टिकल 25 और सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का साफ उल्लंघन है. इस गाने को जरूरी बनाना और इसे नागरिकों पर थोपने की कोशिश देशभक्ति का दिखावा नहीं है. बल्कि, यह चुनावी राजनीति, एक सांप्रदायिक एजेंडा और बुनियादी मुद्दों से लोगों का ध्यान हटाने की जानबूझकर की गई कोशिश को दिखाता है. 

यह दिया गया था आदेश

उनकी यह बात तब आई जब केंद्रीय गृह मंत्रालय ने निर्देश दिया कि जब भी राष्ट्रगान और राष्ट्रगान जन गण मन एक साथ बजाए जाएंगे, तो बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय के लिखे राष्ट्रगान वंदे मातरम के सभी छह पद पहले गाए जाएंगे. 28 जनवरी के एक आदेश में गृह मंत्रालय ने राष्ट्रगान गाने के लिए प्रोटोकॉल का पहला सेट जारी किया, जिसमें बताया गया कि राष्ट्रपति के आने राष्ट्रीय झंडा फहराने और राज्यपालों के भाषण जैसे आधिकारिक समारोहों में 3 मिनट और 10 सेकंड के सभी छह पद गाए जाएंगे.

आदेश में कहा गया, ‘जब राष्ट्रगान और राष्ट्रगान गाए या बजाए जाएंगे, तो राष्ट्रगान पहले गाया या बजाया जाएगा.’इसमें यह भी कहा गया है कि जब राष्ट्रगान बजाया जाएगा तो असेंबली अटेंशन में खड़ी रहेगी. जब भी राष्ट्रगान का ऑफिशियल वर्शन गाया या बजाया जाएगा, तो ऑडियंस को अटेंशन में खड़ा होना चाहिए. हालांकि, जब किसी न्यूज़रील या डॉक्यूमेंट्री के हिस्से के तौर पर राष्ट्रगान बजाया जाएगा, तो ऑडियंस से खड़े होने की उम्मीद नहीं की जाती है.

क्योंकि ऐसा करने से स्क्रीनिंग में रुकावट आ सकती है और राष्ट्रगान की गरिमा बढ़ाने के बजाय गड़बड़ी हो सकती है. निर्देशों में आगे बताया गया है कि स्कूलों में, एक्टिविटीज़ राष्ट्रगान बजाने के साथ शुरू होनी चाहिए. यह कदम वंदे मातरम के बनने की 150वीं सालगिरह के साथ मेल खाता है.

जमीयत उलेमा क्या है?

बता दें कि जमीयत उलेमा-ए-हिंद मुसलमानों का 100 साल पुराना संगठन है. यह सबसे पुराना संगठन बताया जाता है. इस संगठन के एजेंडे में मुसलमानों के सियासी-सामाजिक और धार्मिक मुद्दे रहते हैं. जमीयत संगठन इस्लाम से जुड़ी देवबंदी विचारधारा को मानता है. साल 1919 में देवबंद की स्थापना तत्कालीन इस्लामिक विद्धानों द्वारा की गई थी. इनमें अब्दुल बारी फिरंगी महली, किफायुतल्लाह देहलवी, मुहम्मद इब्राहिम मीर सियालकोटी और सनाउल्लाह अमृतसरी शामिल थे.

इस संगठन में आजादी के वक्त कांग्रेस के साथ अंग्रेजों के विरोध में साथ दिया था. यह देश का बंटवारा करने के खिलाफ भी था. जमीयत उलेमा-ए हिंद का टारगेट इस्लामिक मान्यताओं, पहचान की रक्षा करना, इस्लाम की शिक्षा को बढ़ावा देना है. साथ ही यह इबादतगाहों और इस्लामिक धरोहरों की भी रक्षा करता है.

अरशद मदनी कौन हैं?

मौलाना अरशद मदनी, जमीयत उलेमा-ए-हिन्द के अध्यक्ष हैं. अरशद मदनी क बड़े भाई मौलाना असद मदनी थे. उन्ही के बाद जमीयत उलेमा-ए-हिन्द की डोर अरशद मदनी ने संभाली. साल 2012 में वह मुस्लिम वर्ल्ड लीग, मक्का, केएसए के सदस्य भी चुने गए. इसके साथ ही अरशद मदनी सहारनपुर में दारुल-उलूम देवबंद में हदीस के प्रोफेसर हैं. अरशद मदनी ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के सदस्य हैं. धार्मिक संस्थानों के संरक्षक और सलाहकार के तौर पर भी उन्हें जाना जाता है. उनके पिता मौलाना सैयद हुसैन अहमद मदनी थे. वह भी जमीयत उलमा-ए-हिंद के अध्यक्ष रहे हैं. अरशद ने साल 1997 में मदनी चैरिटेबल ट्रस्ट बनाया, जो पंजाब, हरियाणा और हिमाचल प्रदेश में धार्मिक शिक्षण संस्थानों को चलाता है. इसके अलावा इस ट्रस्ट ने औद्योगिक प्रशिक्षण केंद्र भी बनवाए. 

Pushpendra Trivedi

मैं इंडिया न्यूज में सीनियर सब एडिटर की पोस्ट पर हूं. मैं यहां पर धर्म, लाइफस्टाइल, मनोरंजन, नेशनल, टेक एंड ऑटो और वायरल खबरों को एडिट करता हूं. मुझे पत्रकारिता और कंटेंट की फील्ड में 6 साल से ज्यादा का अनुभव है.

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