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Home > लाइफस्टाइल > ऐतिहासिक जगह है नाना पाटेकर की जन्मभूमि, दूर-दूर से लोग आते हैं देखने ये स्थान, द्वीप पर बना है रहस्यमयी किला…

ऐतिहासिक जगह है नाना पाटेकर की जन्मभूमि, दूर-दूर से लोग आते हैं देखने ये स्थान, द्वीप पर बना है रहस्यमयी किला…

दिग्गज अभिनेता नाना पाटेकर का जन्म महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले के मुरुद-जंजीरा में हुआ था, जो एक ऐतिहासिक स्थान है. यहां स्थित मुरुद-जंजीरा किला कई मायनों में बेहद खास है.

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Last Updated: October 9, 2026 14:42:33 IST

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नाना पाटेकर ने एक बार KBC के शो में अमिताभ बच्चन से कहा था, “मैं एक गांव से आता हूं, और मैं हमेशा एक गांव का आदमी ही रहूंगा. मुझे सबसे ज्यादा घर जैसा महसूस वहीं होता है.”

हाल ही में दिग्गज अभिनेता नाना पाटेकर का 75 वर्ष की आयु में गोवा स्थित अपने घर में हृदयाघात के कारण निधन हो गया. उनका जन्म महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले के मुरुद-जंजीरा में हुआ था. और उनकी जन्मभूमि में देश के सबसे उल्लेखनीय समुद्री किलों में से एक, मुरुद-जंजीरा किला स्थित है.

मुरुद-जंजीरा किले के बारे में 

अरब सागर के एक द्वीप पर बना यह किला बार-बार कब्जा करने के प्रयासों के बावजूद अजेय रहा है. आज राजपुरी से नाव द्वारा यहां तक पहुंचा जा सकता है. मुरुद मुंबई से लगभग 150 किलोमीटर दूर स्थित एक तटीय शहर है. यह अपने समुद्र तट, नवाब के महल और सबसे प्रसिद्ध मुरुद-जंजीरा किले के लिए जाना जाता है. यह किला मुख्य भूमि पर नहीं है. यह अरब सागर से घिरे समुद्र तट के पास एक अंडाकार द्वीप पर स्थित है. मुरुद-जंजीरा किले और उसके आसपास के क्षेत्र का स्थानीय नाम है. “जंजीरा” शब्द अरबी शब्द “जजीरा” से आया है, जिसका अर्थ है द्वीप.

इस पत्थर से बने किले का निर्माण 1567 ईस्वी में मलिक अंबर द्वारा कराया गया था. बाद में यह सिद्दी वंश का गढ़ बन गया और मराठों, मुगलों, पुर्तगालियों और अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा इसे कब्जा करने के बार-बार किए गए प्रयासों का इसने डटकर सामना किया. हमलों के बावजूद, यह किला अजेय रहा. जंजीरा की सबसे दिलचस्प विशेषताओं में से एक इसका मुख्य प्रवेश द्वार है. यह मुख्य भूमि पर स्थित राजपुरी की ओर है, लेकिन दूर से इसे पहचानना मुश्किल है. यह प्रवेश द्वार तभी दिखाई देता है जब कोई नाव किले के पास आती है. खुले समुद्र की ओर एक छोटा द्वार भी है, जिसे दरिया दरवाजा के नाम से जाना जाता है.

किले में वहां के निवासियों की सभी जरूरतें पूरी हो जाती थीं

जंजीरा का महत्व केवल सेना तक ही सीमित नहीं था. 18वीं-19वीं शताब्दी में यह एक जीवंत किला था जिसमें आवासीय क्वार्टर, बैरक, एक मस्जिद और जल स्रोत मौजूद थे. अरब सागर से घिरे होने के बावजूद, किले के अंदर दो गहरे मीठे पानी के तालाब भी बनाए गए थे. हालांकि अब किले का अधिकांश भाग खंडहर में तब्दील हो चुका है. लेकिन ये अवशेष आज भी आगंतुकों को उस जीवन की झलक देते हैं जो कभी यहाँ विद्यमान था.

किले में आज भी लगी हैं तोपें 

किले की विशाल तोपें निश्चित रूप से एक आकर्षण हैं. उनमें से तीन विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं, कलाल बांगड़ी, चावरी और लंडा कसम. कलाल बांगड़ी का वजन 22 टन से अधिक है और यह किले की सबसे बड़ी तोपों में से एक है. ऐसा माना जाता है कि एक समय किले में सैकड़ों तोपें थीं. ये तोपें दीवारों के साथ-साथ तैनात थीं और समुद्र से होने वाले हमलों से जंजीरा की रक्षा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती थीं.

मुरुद के पास स्थित एक छोटे से तटीय गांव राजपुरी से, किला मात्र 20 मिनट की नाव यात्रा की दूरी पर है, जो रोमांच को और भी बढ़ा देता है. वहां पहुंचने पर, चारों ओर से अरब सागर के दृश्य बेहद खूबसूरत लगते हैं.

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Last Updated: October 9, 2026 14:42:33 IST

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नाना पाटेकर ने एक बार KBC के शो में अमिताभ बच्चन से कहा था, “मैं एक गांव से आता हूं, और मैं हमेशा एक गांव का आदमी ही रहूंगा. मुझे सबसे ज्यादा घर जैसा महसूस वहीं होता है.”

हाल ही में दिग्गज अभिनेता नाना पाटेकर का 75 वर्ष की आयु में गोवा स्थित अपने घर में हृदयाघात के कारण निधन हो गया. उनका जन्म महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले के मुरुद-जंजीरा में हुआ था. और उनकी जन्मभूमि में देश के सबसे उल्लेखनीय समुद्री किलों में से एक, मुरुद-जंजीरा किला स्थित है.

मुरुद-जंजीरा किले के बारे में 

अरब सागर के एक द्वीप पर बना यह किला बार-बार कब्जा करने के प्रयासों के बावजूद अजेय रहा है. आज राजपुरी से नाव द्वारा यहां तक पहुंचा जा सकता है. मुरुद मुंबई से लगभग 150 किलोमीटर दूर स्थित एक तटीय शहर है. यह अपने समुद्र तट, नवाब के महल और सबसे प्रसिद्ध मुरुद-जंजीरा किले के लिए जाना जाता है. यह किला मुख्य भूमि पर नहीं है. यह अरब सागर से घिरे समुद्र तट के पास एक अंडाकार द्वीप पर स्थित है. मुरुद-जंजीरा किले और उसके आसपास के क्षेत्र का स्थानीय नाम है. “जंजीरा” शब्द अरबी शब्द “जजीरा” से आया है, जिसका अर्थ है द्वीप.

इस पत्थर से बने किले का निर्माण 1567 ईस्वी में मलिक अंबर द्वारा कराया गया था. बाद में यह सिद्दी वंश का गढ़ बन गया और मराठों, मुगलों, पुर्तगालियों और अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा इसे कब्जा करने के बार-बार किए गए प्रयासों का इसने डटकर सामना किया. हमलों के बावजूद, यह किला अजेय रहा. जंजीरा की सबसे दिलचस्प विशेषताओं में से एक इसका मुख्य प्रवेश द्वार है. यह मुख्य भूमि पर स्थित राजपुरी की ओर है, लेकिन दूर से इसे पहचानना मुश्किल है. यह प्रवेश द्वार तभी दिखाई देता है जब कोई नाव किले के पास आती है. खुले समुद्र की ओर एक छोटा द्वार भी है, जिसे दरिया दरवाजा के नाम से जाना जाता है.

किले में वहां के निवासियों की सभी जरूरतें पूरी हो जाती थीं

जंजीरा का महत्व केवल सेना तक ही सीमित नहीं था. 18वीं-19वीं शताब्दी में यह एक जीवंत किला था जिसमें आवासीय क्वार्टर, बैरक, एक मस्जिद और जल स्रोत मौजूद थे. अरब सागर से घिरे होने के बावजूद, किले के अंदर दो गहरे मीठे पानी के तालाब भी बनाए गए थे. हालांकि अब किले का अधिकांश भाग खंडहर में तब्दील हो चुका है. लेकिन ये अवशेष आज भी आगंतुकों को उस जीवन की झलक देते हैं जो कभी यहाँ विद्यमान था.

किले में आज भी लगी हैं तोपें 

किले की विशाल तोपें निश्चित रूप से एक आकर्षण हैं. उनमें से तीन विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं, कलाल बांगड़ी, चावरी और लंडा कसम. कलाल बांगड़ी का वजन 22 टन से अधिक है और यह किले की सबसे बड़ी तोपों में से एक है. ऐसा माना जाता है कि एक समय किले में सैकड़ों तोपें थीं. ये तोपें दीवारों के साथ-साथ तैनात थीं और समुद्र से होने वाले हमलों से जंजीरा की रक्षा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती थीं.

मुरुद के पास स्थित एक छोटे से तटीय गांव राजपुरी से, किला मात्र 20 मिनट की नाव यात्रा की दूरी पर है, जो रोमांच को और भी बढ़ा देता है. वहां पहुंचने पर, चारों ओर से अरब सागर के दृश्य बेहद खूबसूरत लगते हैं.

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