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पंजाब में सिर्फ भांगड़ा-गिद्दा ही नहीं, ये लोक नृत्य भी है बेहद खास, जानें झूमर की कहानी और खासियत

Jhumar Folk Dance: पंजाब की पहचान सिर्फ भांगड़ा और गिद्दा तक सीमित नहीं है. यहां कई ऐसे लोक नृत्य हैं, जिनमें मिट्टी, खेती, ग्रामीण जीवन और लोक संस्कृति की कहानी छिपी है. इन्हीं में से एक है झूमर, जो अपनी धीमी लय, गोल घेरे में होने वाली प्रस्तुति और पारंपरिक पंजाबी पहनावे के लिए जाना जाता है. इसकी जड़ें अविभाजित पंजाब के सैंडल बार क्षेत्र से जुड़ी मानी जाती हैं. आइए जानते हैं झूमर का इतिहास, इसकी खास चाल और वह वजह जो इसे भांगड़ा से बिल्कुल अलग बनाती है.
Last Updated: September 12, 2026 | 6:47 PM IST
The color of Jhumar is hidden between Bhangra and Gidda - Photo Gallery
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भांगड़ा-गिद्दा के बीच छिपा है झूमर का रंग

पंजाब के लोक नृत्य की बात होते ही भांगड़ा और गिद्दा का नाम सबसे पहले याद आता है, लेकिन पंजाब की लोक संस्कृति इससे कहीं ज्यादा समृद्ध है. झूमर भी यहां की पारंपरिक लोक नृत्य शैली का अहम हिस्सा है. भांगड़ा की तरह इसमें जोशीली छलांगें और तेज मूवमेंट नहीं होते, बल्कि इसकी पहचान धीमी, लयबद्ध और झूमती हुई चाल है. झूमर को पारंपरिक रूप से पुरुषों द्वारा किए जाने वाले नृत्य के रूप में वर्णित किया गया है.

How did the name 'Jhumar' come about? - Photo Gallery
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'झूमर' नाम कैसे पड़ा?

झूमर नाम को पंजाबी शब्द 'झूम' या 'झूमना' से जोड़ा जाता है, जिसका अर्थ मस्ती में लहराना या झूलना है. नृत्य की पूरी शैली में भी यही भाव नजर आता है. कलाकार एक लय में शरीर को झुलाते हुए हाथ-पैरों की चाल मिलाते हैं. यही धीमी और सहज गति झूमर को भांगड़ा से अलग पहचान देती है.

The story of Jhumar is related to this area of ​​Pakistan. - Photo Gallery
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पाकिस्तान के इस इलाके से जुड़ी है झूमर की कहानी

झूमर की जड़ें अविभाजित पंजाब के सैंडल बार क्षेत्र से जुड़ी मानी जाती हैं, जो अब पाकिस्तान में है. लोक-संस्कृति से जुड़े विवरणों में इसे पंजाब के पुराने ग्रामीण और चरवाहा समुदायों की परंपरा से जोड़ा गया है. समय के साथ यह नृत्य पंजाब की व्यापक लोक विरासत का हिस्सा बन गया.

A dance tradition derived from shepherds and farms - Photo Gallery
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चरवाहों और खेतों से निकली नृत्य की परंपरा

झूमर की कहानी पंजाब के ग्रामीण जीवन और खेती-किसानी से भी गहराई से जुड़ी है. लोक परंपराओं में इसके आंदोलनों में मवेशियों की चाल, खेत जोतने, बीज बोने और फसल काटने जैसी गतिविधियों की झलक बताई गई है. फसल अच्छी होने पर खुशी मनाने और मेलों-समारोहों में भी इस तरह के लोक नृत्य किए जाते रहे हैं.

Jhumar is in a round circle, Dholiya is in the middle - Photo Gallery
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गोल घेरे में होता है झूमर, बीच में रहता है ढोलिया

झूमर की सबसे खास पहचान इसकी गोल घेरे वाली प्रस्तुति है. नर्तक एक घेरे में घूमते हुए अपनी चाल और हाथों की लय को मिलाते हैं, जबकि बीच में ढोल बजाने वाला कलाकार ताल देता है. नृत्य की शुरुआत अपेक्षाकृत धीमी होती है और फिर इसकी गति धीरे-धीरे बढ़ती है. नर्तकों के कदम आगे-पीछे होते हैं और हाथों की मुद्राएं ताल के साथ बदलती हैं.

Colorful turban and kurta-jacket are the special identity - Photo Gallery
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रंगीन पगड़ी और कुर्ता-जैकेट है खास पहचान

झूमर की खूबसूरती सिर्फ इसकी चाल में नहीं, बल्कि कलाकारों की पारंपरिक पोशाक में भी दिखाई देती है. पारंपरिक प्रस्तुतियों में पुरुष कलाकार रंगीन पगड़ी या पटका, कुर्ता, लुंगी और जैकेट वेस्टकोट जैसे परिधान पहनते हैं. चमकीले रंग और पारंपरिक पहनावा इस लोक नृत्य को मंच पर खास आकर्षण देते हैं.

Feet dance to the slow beat of drums and folk songs - Photo Gallery
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ढोल की धीमी थाप और लोकगीतों पर थिरकते हैं कदम

झूमर की प्रस्तुति में ढोल या ढोलक की ताल और पंजाबी लोकगीतों की अहम भूमिका होती है. इसकी लय भांगड़ा की तुलना में धीमी और ज्यादा सहज होती है. नर्तक अपने हाथों और पैरों को एक खास ताल में चलाते हुए गोल घेरे में आगे बढ़ते हैं. कई पारंपरिक विवरणों में एक ही ढोलिया के चारों ओर नर्तकों के घूमने का उल्लेख मिलता है.

Jhumar is not just a dance, it is a story of rural life in Punjab. - Photo Gallery
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सिर्फ डांस नहीं, पंजाब के ग्रामीण जीवन की कहानी है झूमर

झूमर को सिर्फ मनोरंजन का साधन मानना इसकी पूरी कहानी नहीं बताता. इसके कदमों और मुद्राओं में ग्रामीण जीवन, खेती, फसल और सामूहिक खुशी की झलक दिखाई देती है. मेलों, शादियों और दूसरे समारोहों में भी इसकी प्रस्तुति की परंपरा रही है. यही वजह है कि भांगड़ा और गिद्दा की लोकप्रियता के बीच भी झूमर पंजाब की लोक विरासत की एक अलग पहचान बनाए हुए है.

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