पंजाब में सिर्फ भांगड़ा-गिद्दा ही नहीं, ये लोक नृत्य भी है बेहद खास, जानें झूमर की कहानी और खासियत
भांगड़ा-गिद्दा के बीच छिपा है झूमर का रंग
पंजाब के लोक नृत्य की बात होते ही भांगड़ा और गिद्दा का नाम सबसे पहले याद आता है, लेकिन पंजाब की लोक संस्कृति इससे कहीं ज्यादा समृद्ध है. झूमर भी यहां की पारंपरिक लोक नृत्य शैली का अहम हिस्सा है. भांगड़ा की तरह इसमें जोशीली छलांगें और तेज मूवमेंट नहीं होते, बल्कि इसकी पहचान धीमी, लयबद्ध और झूमती हुई चाल है. झूमर को पारंपरिक रूप से पुरुषों द्वारा किए जाने वाले नृत्य के रूप में वर्णित किया गया है.
'झूमर' नाम कैसे पड़ा?
झूमर नाम को पंजाबी शब्द 'झूम' या 'झूमना' से जोड़ा जाता है, जिसका अर्थ मस्ती में लहराना या झूलना है. नृत्य की पूरी शैली में भी यही भाव नजर आता है. कलाकार एक लय में शरीर को झुलाते हुए हाथ-पैरों की चाल मिलाते हैं. यही धीमी और सहज गति झूमर को भांगड़ा से अलग पहचान देती है.
पाकिस्तान के इस इलाके से जुड़ी है झूमर की कहानी
झूमर की जड़ें अविभाजित पंजाब के सैंडल बार क्षेत्र से जुड़ी मानी जाती हैं, जो अब पाकिस्तान में है. लोक-संस्कृति से जुड़े विवरणों में इसे पंजाब के पुराने ग्रामीण और चरवाहा समुदायों की परंपरा से जोड़ा गया है. समय के साथ यह नृत्य पंजाब की व्यापक लोक विरासत का हिस्सा बन गया.
चरवाहों और खेतों से निकली नृत्य की परंपरा
झूमर की कहानी पंजाब के ग्रामीण जीवन और खेती-किसानी से भी गहराई से जुड़ी है. लोक परंपराओं में इसके आंदोलनों में मवेशियों की चाल, खेत जोतने, बीज बोने और फसल काटने जैसी गतिविधियों की झलक बताई गई है. फसल अच्छी होने पर खुशी मनाने और मेलों-समारोहों में भी इस तरह के लोक नृत्य किए जाते रहे हैं.
गोल घेरे में होता है झूमर, बीच में रहता है ढोलिया
झूमर की सबसे खास पहचान इसकी गोल घेरे वाली प्रस्तुति है. नर्तक एक घेरे में घूमते हुए अपनी चाल और हाथों की लय को मिलाते हैं, जबकि बीच में ढोल बजाने वाला कलाकार ताल देता है. नृत्य की शुरुआत अपेक्षाकृत धीमी होती है और फिर इसकी गति धीरे-धीरे बढ़ती है. नर्तकों के कदम आगे-पीछे होते हैं और हाथों की मुद्राएं ताल के साथ बदलती हैं.
रंगीन पगड़ी और कुर्ता-जैकेट है खास पहचान
झूमर की खूबसूरती सिर्फ इसकी चाल में नहीं, बल्कि कलाकारों की पारंपरिक पोशाक में भी दिखाई देती है. पारंपरिक प्रस्तुतियों में पुरुष कलाकार रंगीन पगड़ी या पटका, कुर्ता, लुंगी और जैकेट वेस्टकोट जैसे परिधान पहनते हैं. चमकीले रंग और पारंपरिक पहनावा इस लोक नृत्य को मंच पर खास आकर्षण देते हैं.
ढोल की धीमी थाप और लोकगीतों पर थिरकते हैं कदम
झूमर की प्रस्तुति में ढोल या ढोलक की ताल और पंजाबी लोकगीतों की अहम भूमिका होती है. इसकी लय भांगड़ा की तुलना में धीमी और ज्यादा सहज होती है. नर्तक अपने हाथों और पैरों को एक खास ताल में चलाते हुए गोल घेरे में आगे बढ़ते हैं. कई पारंपरिक विवरणों में एक ही ढोलिया के चारों ओर नर्तकों के घूमने का उल्लेख मिलता है.
सिर्फ डांस नहीं, पंजाब के ग्रामीण जीवन की कहानी है झूमर
झूमर को सिर्फ मनोरंजन का साधन मानना इसकी पूरी कहानी नहीं बताता. इसके कदमों और मुद्राओं में ग्रामीण जीवन, खेती, फसल और सामूहिक खुशी की झलक दिखाई देती है. मेलों, शादियों और दूसरे समारोहों में भी इसकी प्रस्तुति की परंपरा रही है. यही वजह है कि भांगड़ा और गिद्दा की लोकप्रियता के बीच भी झूमर पंजाब की लोक विरासत की एक अलग पहचान बनाए हुए है.