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Delhi AIIMS: दुनिया में पहली बार दिल्ली एम्स ने विकसित की नई तकनीक, लिंग और योनि कैंसर के मरीजों का होगा सफल इलाज

AIIMS Delhi: दिल्ली एम्स के सर्जिकल ऑन्कोलॉजी डिपार्टमेंट के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. बाबुल बंसल के मुताबिक पहले दोनों पैर और पेट में 15 चीरे लगाने पड़ते थे, लेकिन, अब सिर्फ पेट में 5 चीरे लगाकर इलाज किया जाता है. इस सफल टेक्निक से अब दूसरे बीमारियों के इलाज में भी फायदा मिलेगा.

Written By: Hasnain Alam
Last Updated: April 21, 2026 21:04:35 IST

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Delhi AIIMS News: दुनिया भर में लिंग कैंसर और योनि कैंसर से पीड़ित मरीजों के लिए पहली बार दिल्ली एम्स में उम्मीद की एक नई किरण जगी है. एम्स के सर्जिकल ऑन्कोलॉजी डॉक्टरों ने एच-आरआईएल तकनीक का इस्तेमाल कर लिंग कैंसर के 6 मरीजों का सफलतापूर्वक इलाज किया है. एम्स के सर्जिकल ऑन्कोलॉजी विभाग के एचओडी डॉ. सुनील कुमार के अनुसार, दुनिया भर में इस तकनीक का यह पहला वर्णन है.

उनके मुताबिक ‘एच-आरआईएल (हाइपोगैस्ट्रिक रोबोटिक ओरिजिनल लिम्फैडेनेक्टॉमी)’ एक नई सर्जिकल तकनीक है- जिसका अभी तक साहित्य में वर्णन नहीं किया गया है. पारंपरिक फेमोरल तरीका तकनीकी रूप से मुश्किल है, जिसमें अक्सर रोबोट को कई बार फिर से लगाना पड़ता है, तीन रोबोटिक डॉकिंग तक और 15 पोर्ट साइट तक की जरूरत होती है.

सिर्फ दो डॉकिंग की होती है जरूरत- डॉ. बाबुल बंसल

AIIMS के सर्जिकल ऑन्कोलॉजी डिपार्टमेंट के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. बाबुल बंसल के अनुसार, इसके उलट, हाइपोगैस्ट्रिक तरीके जैसे रोबोटिक सिस्टम को फिर से लगाने की जरूरत खत्म हो जाती है, सिर्फ दो डॉकिंग की जरूरत होती है, बाइलेटरल इंग्वाइनल और बाइलेटरल पेल्विक लिम्फ नोड डाइसेक्शन के लिए सिर्फ 5 पोर्ट का इस्तेमाल करके किया जा सकता है. पूरा होने और एक्यूरेसी की दर बहुत ज्यादा है.

AIIMS Delhi

डॉ. बाबुल बंसल के मुताबिक पहले दोनों पैर और पेट में 15 चीरे लगाने पड़ते थे, लेकिन, अब सिर्फ पेट में 5 चीरे लगाकर इलाज किया जाता है. इस सफल टेक्निक से अब दूसरे बीमारियों के इलाज में भी फायदा मिलेगा. यह ज्यादा पूरी लिम्फैडेनेक्टॉमी को आसान बनाता है, खासकर फेमोरल ट्रायंगल के निचले तीसरे हिस्से को ठीक करता है, जिसे अक्सर फेमोरल तरीके से ठीक से साफ नहीं किया जाता है.

डॉ. सुनील कुमार ने और क्या बताया?

पारंपरिक रोबोटिक ILND में आम तौर पर होने वाले फ्रैगमेंटेशन के उलट, इंग्वाइनल नोडल पैकेट को एक साथ निकालने में मदद करता है. डॉ. सुनील ने कहा, “यह बल्की इनगुइनल लिम्फैडेनोपैथी वाले मरीजों में संभव है, जहां पारंपरिक दृष्टिकोण को अक्सर एक सीमा माना जाता है और यह उन स्थितियों में एक मूल्यवान वैकल्पिक दृष्टिकोण प्रदान करता है, जहां जांघ-आधारित पोर्ट प्लेसमेंट संभव नहीं है (जैसे, जलन, त्वचा संबंधी स्थितियां).

दूसरी ओर, डॉ. बाबुल ने यह भी कहा, “इस तकनीक को एसोसिएशन ऑफ रोबोटिक एंड इनोवेटिव सर्जन के हाल ही में संपन्न अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन के दौरान प्रतिष्ठित ‘बेस्ट सर्जिकल इनोवेशन अवार्ड’ से सम्मानित किया गया.”

(मनोहर केसरी की रिपोर्ट)

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Last Updated: April 21, 2026 21:04:35 IST

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Delhi AIIMS News: दुनिया भर में लिंग कैंसर और योनि कैंसर से पीड़ित मरीजों के लिए पहली बार दिल्ली एम्स में उम्मीद की एक नई किरण जगी है. एम्स के सर्जिकल ऑन्कोलॉजी डॉक्टरों ने एच-आरआईएल तकनीक का इस्तेमाल कर लिंग कैंसर के 6 मरीजों का सफलतापूर्वक इलाज किया है. एम्स के सर्जिकल ऑन्कोलॉजी विभाग के एचओडी डॉ. सुनील कुमार के अनुसार, दुनिया भर में इस तकनीक का यह पहला वर्णन है.

उनके मुताबिक ‘एच-आरआईएल (हाइपोगैस्ट्रिक रोबोटिक ओरिजिनल लिम्फैडेनेक्टॉमी)’ एक नई सर्जिकल तकनीक है- जिसका अभी तक साहित्य में वर्णन नहीं किया गया है. पारंपरिक फेमोरल तरीका तकनीकी रूप से मुश्किल है, जिसमें अक्सर रोबोट को कई बार फिर से लगाना पड़ता है, तीन रोबोटिक डॉकिंग तक और 15 पोर्ट साइट तक की जरूरत होती है.

सिर्फ दो डॉकिंग की होती है जरूरत- डॉ. बाबुल बंसल

AIIMS के सर्जिकल ऑन्कोलॉजी डिपार्टमेंट के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. बाबुल बंसल के अनुसार, इसके उलट, हाइपोगैस्ट्रिक तरीके जैसे रोबोटिक सिस्टम को फिर से लगाने की जरूरत खत्म हो जाती है, सिर्फ दो डॉकिंग की जरूरत होती है, बाइलेटरल इंग्वाइनल और बाइलेटरल पेल्विक लिम्फ नोड डाइसेक्शन के लिए सिर्फ 5 पोर्ट का इस्तेमाल करके किया जा सकता है. पूरा होने और एक्यूरेसी की दर बहुत ज्यादा है.

AIIMS Delhi

डॉ. बाबुल बंसल के मुताबिक पहले दोनों पैर और पेट में 15 चीरे लगाने पड़ते थे, लेकिन, अब सिर्फ पेट में 5 चीरे लगाकर इलाज किया जाता है. इस सफल टेक्निक से अब दूसरे बीमारियों के इलाज में भी फायदा मिलेगा. यह ज्यादा पूरी लिम्फैडेनेक्टॉमी को आसान बनाता है, खासकर फेमोरल ट्रायंगल के निचले तीसरे हिस्से को ठीक करता है, जिसे अक्सर फेमोरल तरीके से ठीक से साफ नहीं किया जाता है.

डॉ. सुनील कुमार ने और क्या बताया?

पारंपरिक रोबोटिक ILND में आम तौर पर होने वाले फ्रैगमेंटेशन के उलट, इंग्वाइनल नोडल पैकेट को एक साथ निकालने में मदद करता है. डॉ. सुनील ने कहा, “यह बल्की इनगुइनल लिम्फैडेनोपैथी वाले मरीजों में संभव है, जहां पारंपरिक दृष्टिकोण को अक्सर एक सीमा माना जाता है और यह उन स्थितियों में एक मूल्यवान वैकल्पिक दृष्टिकोण प्रदान करता है, जहां जांघ-आधारित पोर्ट प्लेसमेंट संभव नहीं है (जैसे, जलन, त्वचा संबंधी स्थितियां).

दूसरी ओर, डॉ. बाबुल ने यह भी कहा, “इस तकनीक को एसोसिएशन ऑफ रोबोटिक एंड इनोवेटिव सर्जन के हाल ही में संपन्न अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन के दौरान प्रतिष्ठित ‘बेस्ट सर्जिकल इनोवेशन अवार्ड’ से सम्मानित किया गया.”

(मनोहर केसरी की रिपोर्ट)

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