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चाय बेचने वाले से जायंट किलर तक, सज्जन कुमार ने दिल्ली के पूर्व सीएम ब्रह्म प्रकाश को कैसे हराया?

Sajjan Kumar Biography: पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के बेटे संजय गांधी के 'नवरत्नों' में से एक सज्जन कुमार का दिल्ली की राजनीति में जबरदस्त दबदबा था. हालांकि, जब से दिल्ली दंगों के सिलसिले में उनका नाम सामने आया है, उनकी साख दांव पर लग गई है; कई मौकों पर लोकसभा उम्मीदवारों की सूची से उनका नाम हटा दिया गया, और दोषी ठहराए जाने के बाद, वे राजनीति के शिखर से सीधे ज़मीन पर आ गिरे.

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Published: April 26, 2026 19:54:00 IST
Last Updated: 2026-04-26 19:57:30

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Sajjan Kumar Political History: एक समय था जब सज्जन कुमार का दिल्ली की राजनीति में ज़बरदस्त दबदबा था और उन्हें पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के बेटे संजय गांधी के ‘नवरत्नों’ (करीबी लोगों) में गिना जाता था. हालांकि, जब से दिल्ली दंगों के सिलसिले में उनका नाम सामने आया है, उनकी साख दांव पर लग गई है; कई मौकों पर लोकसभा उम्मीदवारों की सूची से उनका नाम हटा दिया गया, और दोषी ठहराए जाने के बाद, वे राजनीति के शिखर से सीधे ज़मीन पर आ गिरे.
 
अब स्थिति ऐसी है कि जो लोग कभी उनसे करीबी रिश्ते बनाने की होड़ में रहते थे, उन्होंने अब उनसे पूरी तरह से दूरी बना ली है. ऐसे में चलिए विस्तार से जानें कि सज्जन सिंह चाय बेचने वाले से जायंट किलर कैसे बने और उन्होंने दिल्ली के पूर्व सीएम चौधरी ब्रह्म प्रकाश को कैसे हराया
 

डेयरी का कारोबार शुरू किया

अपने शुरुआती दिनों में, सज्जन कुमार डेयरी यानी चाय बेचने का कारोबार चलाते थे. किस्मत उन पर इतनी मेहरबान हुई कि वे पहले नगर पार्षद के पद तक पहुंचे और उसके बाद लोकसभा तक का सफर तय किया. संजय गांधी से अपनी करीबी की बदौलत, वे कांग्रेस पार्टी के दिग्गज नेताओं में गिने जाने लगे.
 
शुरू से ही सज्जन कुमार का व्यक्तित्व काफी प्रभावशाली और दबंग था; इसी खासियत की वजह से उनकी मुलाकात कांग्रेस नेता एच.के.एल. भगत से हुई, जिन्हें अक्सर दिल्ली का बेताज बादशाह कहा जाता था. भगत ने ही सज्जन को नगर पार्षद का चुनाव लड़ने के लिए टिकट दिलवाया था, जिस सीट पर सज्जन ने बाद में जीत हासिल की. ​​उस पल के बाद से, सज्जन ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा. इसी दौर में संजय गांधी की नजर उन पर पड़ी.
 

दिल्ली के पहले मुख्यमंत्री को कैसे हराया?

1977 में, जब कांग्रेस पार्टी मुश्किल दौर से गुजर रही थी, तब उसने सज्जन कुमार को बाहरी दिल्ली से अपना उम्मीदवार बनाया. सज्जन ने अपने प्रतिद्वंद्वी ब्रह्म प्रकाश को हराया, जो इससे पहले दिल्ली के पहले मुख्यमंत्री रह चुके थे. इस जीत के साथ ही, राजनीतिक गलियारों में सज्जन कुमार का कद और अहमियत काफी बढ़ गई. 
 

1984 के दंगे और राजनीति पर एक ग्रहण

1984 को इंदिरा गांधी की हत्या के ठीक अगले दिन पूरे दिल्ली में सिख समुदाय को निशाना बनाकर हमले भड़क उठे. सरकारी आंकड़ों के अनुसार, अकेले दिल्ली में ही सिख समुदाय के 2,733 सदस्यों की हत्या कर दी गई. सज्जन कुमार और जगदीश टाइटलर दिल्ली कांग्रेस के स्थानीय नेता थे; वे इन दंगों से जुड़े सबसे कुख्यात चेहरे बन गए. सज्जन कुमार पर दिल्ली कैंट इलाके में सिख समुदाय के छह सदस्यों की हत्या में शामिल होने का आरोप लगा था. नतीजतन, उन्हें 1989 के चुनावों के लिए पार्टी का टिकट नहीं दिया गया. इसके बजाय, टिकट भारत सिंह को दिया गया, और अंततः कांग्रेस पार्टी वह सीट हार गई.
 

2009 में उन्हें टिकट क्यों नहीं मिला?

इसी तरह, कांग्रेस पार्टी ने उन्हें 2004 में टिकट दिया, और वे एक बार फिर चुनाव जीतने में सफल रहे. उन्हें 2009 के चुनावों के लिए टिकट दिया गया था; हालांकि, उनकी उम्मीदवारी तब वापस ले ली गई जब एक सिख पत्रकार ने तत्कालीन कांग्रेस गृह मंत्री, पी. चिदंबरम पर जूता फेंक दिया. फिर भी, सज्जन अपने भाई, रमेश कुमार के लिए टिकट पाने में सफल रहे और उनकी जीत सुनिश्चित की. इसके बाद, रमेश कुमार 2014 के चुनावों में हार गए, और सज्जन कुमार भी धीरे-धीरे राजनीति से दूर होते चले गए. दंगों के मामलों में दोषी ठहराए जाने के बाद, उनका राजनीतिक करियर पूरी तरह समाप्त हो गया, और वे वर्तमान में दो अलग-अलग मामलों में सज़ा काट रहे हैं.

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Published: April 26, 2026 19:54:00 IST
Last Updated: 2026-04-26 19:57:30

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Sajjan Kumar Political History: एक समय था जब सज्जन कुमार का दिल्ली की राजनीति में ज़बरदस्त दबदबा था और उन्हें पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के बेटे संजय गांधी के ‘नवरत्नों’ (करीबी लोगों) में गिना जाता था. हालांकि, जब से दिल्ली दंगों के सिलसिले में उनका नाम सामने आया है, उनकी साख दांव पर लग गई है; कई मौकों पर लोकसभा उम्मीदवारों की सूची से उनका नाम हटा दिया गया, और दोषी ठहराए जाने के बाद, वे राजनीति के शिखर से सीधे ज़मीन पर आ गिरे.
 
अब स्थिति ऐसी है कि जो लोग कभी उनसे करीबी रिश्ते बनाने की होड़ में रहते थे, उन्होंने अब उनसे पूरी तरह से दूरी बना ली है. ऐसे में चलिए विस्तार से जानें कि सज्जन सिंह चाय बेचने वाले से जायंट किलर कैसे बने और उन्होंने दिल्ली के पूर्व सीएम चौधरी ब्रह्म प्रकाश को कैसे हराया
 

डेयरी का कारोबार शुरू किया

अपने शुरुआती दिनों में, सज्जन कुमार डेयरी यानी चाय बेचने का कारोबार चलाते थे. किस्मत उन पर इतनी मेहरबान हुई कि वे पहले नगर पार्षद के पद तक पहुंचे और उसके बाद लोकसभा तक का सफर तय किया. संजय गांधी से अपनी करीबी की बदौलत, वे कांग्रेस पार्टी के दिग्गज नेताओं में गिने जाने लगे.
 
शुरू से ही सज्जन कुमार का व्यक्तित्व काफी प्रभावशाली और दबंग था; इसी खासियत की वजह से उनकी मुलाकात कांग्रेस नेता एच.के.एल. भगत से हुई, जिन्हें अक्सर दिल्ली का बेताज बादशाह कहा जाता था. भगत ने ही सज्जन को नगर पार्षद का चुनाव लड़ने के लिए टिकट दिलवाया था, जिस सीट पर सज्जन ने बाद में जीत हासिल की. ​​उस पल के बाद से, सज्जन ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा. इसी दौर में संजय गांधी की नजर उन पर पड़ी.
 

दिल्ली के पहले मुख्यमंत्री को कैसे हराया?

1977 में, जब कांग्रेस पार्टी मुश्किल दौर से गुजर रही थी, तब उसने सज्जन कुमार को बाहरी दिल्ली से अपना उम्मीदवार बनाया. सज्जन ने अपने प्रतिद्वंद्वी ब्रह्म प्रकाश को हराया, जो इससे पहले दिल्ली के पहले मुख्यमंत्री रह चुके थे. इस जीत के साथ ही, राजनीतिक गलियारों में सज्जन कुमार का कद और अहमियत काफी बढ़ गई. 
 

1984 के दंगे और राजनीति पर एक ग्रहण

1984 को इंदिरा गांधी की हत्या के ठीक अगले दिन पूरे दिल्ली में सिख समुदाय को निशाना बनाकर हमले भड़क उठे. सरकारी आंकड़ों के अनुसार, अकेले दिल्ली में ही सिख समुदाय के 2,733 सदस्यों की हत्या कर दी गई. सज्जन कुमार और जगदीश टाइटलर दिल्ली कांग्रेस के स्थानीय नेता थे; वे इन दंगों से जुड़े सबसे कुख्यात चेहरे बन गए. सज्जन कुमार पर दिल्ली कैंट इलाके में सिख समुदाय के छह सदस्यों की हत्या में शामिल होने का आरोप लगा था. नतीजतन, उन्हें 1989 के चुनावों के लिए पार्टी का टिकट नहीं दिया गया. इसके बजाय, टिकट भारत सिंह को दिया गया, और अंततः कांग्रेस पार्टी वह सीट हार गई.
 

2009 में उन्हें टिकट क्यों नहीं मिला?

इसी तरह, कांग्रेस पार्टी ने उन्हें 2004 में टिकट दिया, और वे एक बार फिर चुनाव जीतने में सफल रहे. उन्हें 2009 के चुनावों के लिए टिकट दिया गया था; हालांकि, उनकी उम्मीदवारी तब वापस ले ली गई जब एक सिख पत्रकार ने तत्कालीन कांग्रेस गृह मंत्री, पी. चिदंबरम पर जूता फेंक दिया. फिर भी, सज्जन अपने भाई, रमेश कुमार के लिए टिकट पाने में सफल रहे और उनकी जीत सुनिश्चित की. इसके बाद, रमेश कुमार 2014 के चुनावों में हार गए, और सज्जन कुमार भी धीरे-धीरे राजनीति से दूर होते चले गए. दंगों के मामलों में दोषी ठहराए जाने के बाद, उनका राजनीतिक करियर पूरी तरह समाप्त हो गया, और वे वर्तमान में दो अलग-अलग मामलों में सज़ा काट रहे हैं.

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