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Who is Deepanshu Shokeen: कौन हैं दीपांशु शोकीन? बस कंडक्टर का बेटा, जिसने खाली पांव लड़ा चुनाव, बने DUSU के उपाध्यक्ष

DU Election: बस कंडक्टर पिता और आंगनवाड़ी वर्कर मां के बेटे दीपांशु शोकीन ने बिना किसी बड़ी पार्टी के सहयोग के DUSU चुनाव में इतिहास रच दिया है. आखिर कौन हैं दीपांशु शोकीन, जिन्होंने छात्रों के हक के लिए नंगे पांव चुनाव लड़ा? जानिए NSUI से बगावत से लेकर DUSU के नए उपाध्यक्ष बनने तक का उनका सफर.

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Last Updated: September 19, 2026 17:13:54 IST

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दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ (DUSU) चुनाव 2026 में इस बार सिर्फ ABVP और NSUI की पारंपरिक टक्कर ही नहीं दिखी, बल्कि एक निर्दलीय उम्मीदवार ने पूरे चुनाव का रुख बदलकर इतिहास रच दिया.

उपाध्यक्ष (Vice President) पद पर निर्दलीय चुनाव लड़ रहे दीपांशु शोकीन ने ABVP के इशू मौर्या और NSUI के वीर छत्रपति जैसे बड़े चेहरों को भारी मतों से हराकर शानदार जीत हासिल की है. मतगणना के दौर से ही दीपांशु ने अपनी बढ़त मजबूत बनाए रखी थी और अंत में 30,000 से अधिक वोट हासिल कर उपाध्यक्ष का पद अपने नाम कर लिया.

कौन हैं दीपांशु शोकीन?(Who is Deepanshu Shokeen)

शिक्षा: दीपांशु दिल्ली विश्वविद्यालय के बौद्ध अध्ययन विभाग (Department of Buddhist Studies) के छात्र हैं. इससे पहले उन्होंने शहीद भगत सिंह कॉलेज से अपनी ग्रेजुएशन पूरी की है.

वे दिल्ली के पीरागढ़ी इलाके के रहने वाले हैं. एक सामान्य और मेहनती परिवार से आने वाले दीपांशु के पिता बस कंडक्टर हैं और मां आंगनवाड़ी कार्यकर्ता हैं. उनके पिता चाहते थे कि वे यूपीएससी (UPSC) की तैयारी करें और सरकारी सेवा में जाएं, लेकिन दीपांशु का मन हमेशा से छात्र राजनीति और छात्रों की समस्याओं को उठाने में था.

NSUI से बागी होकर निर्दलीय लड़ने का फैसला

दीपांशु की यह जीत इसलिए भी खास है क्योंकि उन्होंने इस चुनाव की शुरुआत निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में नहीं की थी.  वे शुरुआत में कांग्रेस के छात्र संगठन NSUI से जुड़े थे और उपाध्यक्ष पद के लिए टिकट का दावा कर रहे थे. उन्होंने NSUI की तरफ से नामांकन पत्र भी दाखिल कर दिया था, लेकिन बाद में संगठन ने उनसे नाम वापस लेने को कहा. दीपांशु ने पीछे हटने के बजाय छात्र हितों के लिए अकेले चुनाव लड़ने का फैसला किया. उन्होंने अपना पर्चा वापस नहीं लिया और एक निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में मैदान में डटे रहे. उनके इस कदम से यह चुनाव द्विध्रुवीय न रहकर बेहद दिलचस्प मोड़ पर आ गया.

चुनाव में उनके अभियान के मुख्य मुद्दे

दीपांशु शोकीन के प्रचार अभियान ने आम छात्रों का ध्यान अपनी ओर खींचा. दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्रों के लिए आवास और सुरक्षा हमेशा से एक बड़ा मुद्दा रहा है. सत्या निकेतन में इमारत ढहने की दुखद घटना के बाद दीपांशु ने छात्रों को न्याय दिलाने के लिए खुलकर विरोध जताया. उन्होंने कसम खाई थी कि जब तक छात्रों को इंसाफ नहीं मिलेगा, वे चप्पल-जूते नहीं पहनेंगे. बिना जूतों के किया गया उनका यह अनोखा और संवेदनशील विरोध छात्रों के बीच काफी चर्चा में रहा. उन्होंने प्राइवेट पीजी के भारी किराए और हॉस्टल की कमी को अपने प्रचार का मुख्य आधार बनाया.

अफवाहें और राजनीतिक चर्चाएं

चुनाव प्रचार के दौरान यह चर्चा भी चली कि दीपांशु और ABVP के अध्यक्ष पद के प्रत्याशी यश डबास के बीच कोई अंदरूनी राजनीतिक समझौता है, क्योंकि दोनों जाट समुदाय से आते हैं. हालांकि, दीपांशु और यश डबास दोनों ने ही इन बातों को खारिज कर दिया था.

चर्चा यह भी थी कि आम आदमी पार्टी के छात्र संगठन (ASAP) ने भी दीपांशु को अपने बैनर तले चुनाव लड़ने का न्योता दिया था, लेकिन उन्होंने किसी संगठन से जुड़ने के बजाय अकेले ही चुनाव लड़ना बेहतर समझा.

दीपांशु ने कैसे बदला DUSU चुनाव का माहौल?

दिल्ली विश्वविद्यालय में आमतौर पर ABVP या NSUI का ही दबदबा रहता है. लेकिन दीपांशु शोकीन ने बिना किसी बड़ी पार्टी के सहयोग के जिस तरह से आम छात्रों का भरोसा जीता, उसने यह साबित कर दिया कि अगर जमीनी मुद्दों पर काम किया जाए तो बड़े-बड़े राजनीतिक संगठनों को भी चुनौती दी जा सकती है.

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दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ (DUSU) चुनाव 2026 में इस बार सिर्फ ABVP और NSUI की पारंपरिक टक्कर ही नहीं दिखी, बल्कि एक निर्दलीय उम्मीदवार ने पूरे चुनाव का रुख बदलकर इतिहास रच दिया.

उपाध्यक्ष (Vice President) पद पर निर्दलीय चुनाव लड़ रहे दीपांशु शोकीन ने ABVP के इशू मौर्या और NSUI के वीर छत्रपति जैसे बड़े चेहरों को भारी मतों से हराकर शानदार जीत हासिल की है. मतगणना के दौर से ही दीपांशु ने अपनी बढ़त मजबूत बनाए रखी थी और अंत में 30,000 से अधिक वोट हासिल कर उपाध्यक्ष का पद अपने नाम कर लिया.

कौन हैं दीपांशु शोकीन?(Who is Deepanshu Shokeen)

शिक्षा: दीपांशु दिल्ली विश्वविद्यालय के बौद्ध अध्ययन विभाग (Department of Buddhist Studies) के छात्र हैं. इससे पहले उन्होंने शहीद भगत सिंह कॉलेज से अपनी ग्रेजुएशन पूरी की है.

वे दिल्ली के पीरागढ़ी इलाके के रहने वाले हैं. एक सामान्य और मेहनती परिवार से आने वाले दीपांशु के पिता बस कंडक्टर हैं और मां आंगनवाड़ी कार्यकर्ता हैं. उनके पिता चाहते थे कि वे यूपीएससी (UPSC) की तैयारी करें और सरकारी सेवा में जाएं, लेकिन दीपांशु का मन हमेशा से छात्र राजनीति और छात्रों की समस्याओं को उठाने में था.

NSUI से बागी होकर निर्दलीय लड़ने का फैसला

दीपांशु की यह जीत इसलिए भी खास है क्योंकि उन्होंने इस चुनाव की शुरुआत निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में नहीं की थी.  वे शुरुआत में कांग्रेस के छात्र संगठन NSUI से जुड़े थे और उपाध्यक्ष पद के लिए टिकट का दावा कर रहे थे. उन्होंने NSUI की तरफ से नामांकन पत्र भी दाखिल कर दिया था, लेकिन बाद में संगठन ने उनसे नाम वापस लेने को कहा. दीपांशु ने पीछे हटने के बजाय छात्र हितों के लिए अकेले चुनाव लड़ने का फैसला किया. उन्होंने अपना पर्चा वापस नहीं लिया और एक निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में मैदान में डटे रहे. उनके इस कदम से यह चुनाव द्विध्रुवीय न रहकर बेहद दिलचस्प मोड़ पर आ गया.

चुनाव में उनके अभियान के मुख्य मुद्दे

दीपांशु शोकीन के प्रचार अभियान ने आम छात्रों का ध्यान अपनी ओर खींचा. दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्रों के लिए आवास और सुरक्षा हमेशा से एक बड़ा मुद्दा रहा है. सत्या निकेतन में इमारत ढहने की दुखद घटना के बाद दीपांशु ने छात्रों को न्याय दिलाने के लिए खुलकर विरोध जताया. उन्होंने कसम खाई थी कि जब तक छात्रों को इंसाफ नहीं मिलेगा, वे चप्पल-जूते नहीं पहनेंगे. बिना जूतों के किया गया उनका यह अनोखा और संवेदनशील विरोध छात्रों के बीच काफी चर्चा में रहा. उन्होंने प्राइवेट पीजी के भारी किराए और हॉस्टल की कमी को अपने प्रचार का मुख्य आधार बनाया.

अफवाहें और राजनीतिक चर्चाएं

चुनाव प्रचार के दौरान यह चर्चा भी चली कि दीपांशु और ABVP के अध्यक्ष पद के प्रत्याशी यश डबास के बीच कोई अंदरूनी राजनीतिक समझौता है, क्योंकि दोनों जाट समुदाय से आते हैं. हालांकि, दीपांशु और यश डबास दोनों ने ही इन बातों को खारिज कर दिया था.

चर्चा यह भी थी कि आम आदमी पार्टी के छात्र संगठन (ASAP) ने भी दीपांशु को अपने बैनर तले चुनाव लड़ने का न्योता दिया था, लेकिन उन्होंने किसी संगठन से जुड़ने के बजाय अकेले ही चुनाव लड़ना बेहतर समझा.

दीपांशु ने कैसे बदला DUSU चुनाव का माहौल?

दिल्ली विश्वविद्यालय में आमतौर पर ABVP या NSUI का ही दबदबा रहता है. लेकिन दीपांशु शोकीन ने बिना किसी बड़ी पार्टी के सहयोग के जिस तरह से आम छात्रों का भरोसा जीता, उसने यह साबित कर दिया कि अगर जमीनी मुद्दों पर काम किया जाए तो बड़े-बड़े राजनीतिक संगठनों को भी चुनौती दी जा सकती है.

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