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Home > राज्य > उत्तर प्रदेश > जब मशहूर तवायफ के सामने चुनाव में उतरे हकीम साहब, शेर-ओ-शायरी में हुआ चुनाव प्रचार, क्या रहा नतीजा?

जब मशहूर तवायफ के सामने चुनाव में उतरे हकीम साहब, शेर-ओ-शायरी में हुआ चुनाव प्रचार, क्या रहा नतीजा?

Political Kissa: आजादी से पहले लखनऊ में साल 1920 में नगर पालिका का चुनाव हुआ था. जहां देश की मशहूर तवायफ दिलरुबा जान चुनाव मैदान में थीं. उसके सामने हकीम शमसुद्दीन साहब थे. शहर में तवायफ दिलरुबा जान की लोकप्रियता काफी अधिक थीं. जिसकी वजह से हकीम साहब ने अपने एक दोस्त से कहा- मियां, ये हमें कहां फंसा दिया?

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Last Updated: April 22, 2026 18:06:17 IST

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Tawaif Dulruba Jaan: देश के 5 राज्यों में चुनावी माहौल चल रहा है. तीन राज्यों में वोट डाले जा चुके हैं. जबकि 2 राज्यों में कल यानी 23 अप्रैल, 2026 को वोट डाले जाएंगे. ऐसे में आज हम आपको राजनीतिक किस्से में एक ऐसी कहानी के बारे में बताएंगे. जहां एक तवायफ के सामने हकीम साहब चुनाव लड़ रहे थे. पूरी कहानी क्या है? आइए जानते हैं.

दरअसल, ये राजनीतिक किस्सा आजादी से पहले का है. जहां 1920 में लखनऊ में नगर पालिका का चुनाव होने वाला था. तभी शहर की मशहूर तवायफ दिलरुबा जान ने चुनाव लड़ने का एलान कर दिया.

दिलरुबा के सामने हकीम साहब

चुनाव में दिलरुबा का नाम सुनते ही सभी से चुनाव लड़ने से इन्कार कर दिया. जानकारी सामने आ रही है कि शहर के अधिकतर लोग दिलरुबा जान के दिवाने थे. जिसकी वजह से कोई भी उसके सामने चुनाव लड़ने को तैयार नहीं था. तो वहीं दूसरी तरफ शहऱ के कई लोग इस वजह से भी हैरान थे कि कोठे पर महफिल जमाने वाली एक तवायफ चुनाव कैसे लड़ सकती है?

मियां ये हमें कहां फंसा दिया?

काफी कोशिशों के बाद कुछ लोगों ने अकबरी गेट के पास रहने वाले हकीम शमसुद्दीन को दिलरुबा जान के खिलाफ चुनाव लड़ने के लिए तैयार किया. लेकिन सबसे बड़ी बात थी कि हकीम साहब को बहुत कम लोग जानते थे. दूसरी तरफ दिलरुबा जान के दीवाने शहर के गली-गली में मौजूद थे. जब हकीम साहब को दिलरुबा जान की शोहरत का पता चला तो वो उन्होंने एक बार अपने दोस्त से कहा कि मियां ये हमें कहां फंसा दिया?

दोस्तों को सूझी तरकीब

हकीम शमसुद्दीन साहब की हताशा को देखकर दोस्तों को एक तरकीब सूझी. उन्होंने एक ऐसा नारा तैयार किया जो लखनऊ की हर गलियों में गूंजने लगा. जिसे गलियों की अलग-अलग दीवारों पर लिख दिया गया. दरअसल, वो नारा था ‘’है हिदायत लखनऊ के तमाम वोटर-ए-शौकीन को, दिल दीजिए दिलरुबा को, वोट शमसुद्दीन को’. जैसे ही दिलरुबा जान तक ये खबर पहुंची तो उसने भी इसी अंदाज में इसका जवाब देने का निर्णय लिया. इसके बाद उन्होंने नारा दिया, ‘’है हिदायत लखनऊ के तमाम वोटर-ए-शौकीन को, वोट देना दिलरुबा को, नब्ज शमसुद्दीन को.’ ये मीठी नोंक-झोंक वाला चुनाव उस समय खूब चर्चा बटोर रहा था.

हकीम शमसुद्दीन जीत गए चुनाव

चुनाव के दिन लोगों ने मतदान किया. दोनों के बीच कड़ी टक्कर देखने को मिल रही थी. जब चुनाव के नतीजे सामने आए तो पूरा शहर चौंक गया. हकीम शमसुद्दीन बेहद मामूली अंतर से चुनाव जीत गए. जब दिलरुबा जान को पता चला कि वे चुनाव हार गईं तो उन्होंने निराश होते हुए बस इतना कहा, ‘चौक में आशिक कम और मरीज ज्यादा हैं.’

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Tawaif Dulruba Jaan: देश के 5 राज्यों में चुनावी माहौल चल रहा है. तीन राज्यों में वोट डाले जा चुके हैं. जबकि 2 राज्यों में कल यानी 23 अप्रैल, 2026 को वोट डाले जाएंगे. ऐसे में आज हम आपको राजनीतिक किस्से में एक ऐसी कहानी के बारे में बताएंगे. जहां एक तवायफ के सामने हकीम साहब चुनाव लड़ रहे थे. पूरी कहानी क्या है? आइए जानते हैं.

दरअसल, ये राजनीतिक किस्सा आजादी से पहले का है. जहां 1920 में लखनऊ में नगर पालिका का चुनाव होने वाला था. तभी शहर की मशहूर तवायफ दिलरुबा जान ने चुनाव लड़ने का एलान कर दिया.

दिलरुबा के सामने हकीम साहब

चुनाव में दिलरुबा का नाम सुनते ही सभी से चुनाव लड़ने से इन्कार कर दिया. जानकारी सामने आ रही है कि शहर के अधिकतर लोग दिलरुबा जान के दिवाने थे. जिसकी वजह से कोई भी उसके सामने चुनाव लड़ने को तैयार नहीं था. तो वहीं दूसरी तरफ शहऱ के कई लोग इस वजह से भी हैरान थे कि कोठे पर महफिल जमाने वाली एक तवायफ चुनाव कैसे लड़ सकती है?

मियां ये हमें कहां फंसा दिया?

काफी कोशिशों के बाद कुछ लोगों ने अकबरी गेट के पास रहने वाले हकीम शमसुद्दीन को दिलरुबा जान के खिलाफ चुनाव लड़ने के लिए तैयार किया. लेकिन सबसे बड़ी बात थी कि हकीम साहब को बहुत कम लोग जानते थे. दूसरी तरफ दिलरुबा जान के दीवाने शहर के गली-गली में मौजूद थे. जब हकीम साहब को दिलरुबा जान की शोहरत का पता चला तो वो उन्होंने एक बार अपने दोस्त से कहा कि मियां ये हमें कहां फंसा दिया?

दोस्तों को सूझी तरकीब

हकीम शमसुद्दीन साहब की हताशा को देखकर दोस्तों को एक तरकीब सूझी. उन्होंने एक ऐसा नारा तैयार किया जो लखनऊ की हर गलियों में गूंजने लगा. जिसे गलियों की अलग-अलग दीवारों पर लिख दिया गया. दरअसल, वो नारा था ‘’है हिदायत लखनऊ के तमाम वोटर-ए-शौकीन को, दिल दीजिए दिलरुबा को, वोट शमसुद्दीन को’. जैसे ही दिलरुबा जान तक ये खबर पहुंची तो उसने भी इसी अंदाज में इसका जवाब देने का निर्णय लिया. इसके बाद उन्होंने नारा दिया, ‘’है हिदायत लखनऊ के तमाम वोटर-ए-शौकीन को, वोट देना दिलरुबा को, नब्ज शमसुद्दीन को.’ ये मीठी नोंक-झोंक वाला चुनाव उस समय खूब चर्चा बटोर रहा था.

हकीम शमसुद्दीन जीत गए चुनाव

चुनाव के दिन लोगों ने मतदान किया. दोनों के बीच कड़ी टक्कर देखने को मिल रही थी. जब चुनाव के नतीजे सामने आए तो पूरा शहर चौंक गया. हकीम शमसुद्दीन बेहद मामूली अंतर से चुनाव जीत गए. जब दिलरुबा जान को पता चला कि वे चुनाव हार गईं तो उन्होंने निराश होते हुए बस इतना कहा, ‘चौक में आशिक कम और मरीज ज्यादा हैं.’

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