History of Ganeshotsav: गणेश उत्सव आज देश के सबसे बड़े और लोकप्रिय त्योहारों में शामिल है. महाराष्ट्र से लेकर देश के अलग-अलग हिस्सों तक गणपति बप्पा की भव्य प्रतिमाएं स्थापित की जाती हैं और पंडालों में बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं. इस साल गणेश उत्सव 14 से 25 सितंबर तक मनाया जाएगा. मुंबई का लालबागचा राजा हो या देश के दूसरे प्रसिद्ध गणपति पंडाल, उत्सव के दौरान हर जगह भक्ति और उल्लास का माहौल नजर आता है. लेकिन आज जिस गणेशोत्सव को लाखों लोगों के एक साथ आने वाले सार्वजनिक पर्व के रूप में देखा जाता है, उसका सफर काफी दिलचस्प रहा है. गणपति पूजा की परंपरा सदियों पुरानी है, लेकिन सार्वजनिक गणेशोत्सव ने एक अलग रूप में लोगों को जोड़ने का काम किया. इस बदलाव की कहानी छत्रपति शिवाजी महाराज के समय से शुरू होकर पेशवाओं के दौर और फिर लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक तक पहुंचती है.
शिवाजी महाराज के समय से जुड़ी गणेश उत्सव की परंपरा
गणपति पूजा को मराठा साम्राज्य के दौर से भी जोड़ा जाता है. माना जाता है कि छत्रपति शिवाजी महाराज ने पुणे में हिंदू संस्कृति और भक्ति भावना को बढ़ावा देने के लिए गणेश उत्सव को प्रोत्साहित किया. उस दौर में धार्मिक और सांस्कृतिक गतिविधियों के जरिए समाज में एकजुटता की भावना को मजबूत करने पर भी जोर दिया जाता था. समय के साथ गणेश पूजा की यह परंपरा आगे बढ़ी और 18वीं सदी में पेशवाओं के शासनकाल में इसे राजसी संरक्षण मिला. पेशवाओं के दौर में गणेश उत्सव बड़े स्तर पर आयोजित किया जाता था.
शनिवार वाड़ा में होता था भव्य आयोजन
पेशवाओं के शासनकाल में पुणे का शनिवार वाड़ा गणेशोत्सव के प्रमुख केंद्रों में शामिल रहा. यहां भव्य तरीके से गणपति उत्सव मनाया जाता था. राजसी संरक्षण मिलने के कारण उत्सव का स्वरूप भी काफी व्यापक था और इसमें बड़ी संख्या में लोग शामिल होते थे. हालांकि, अंग्रेजी शासन के दौरान पेशवा साम्राज्य के पतन के साथ गणेश उत्सव का राजसी संरक्षण भी खत्म हो गया. इसके बाद सार्वजनिक स्तर पर होने वाला भव्य आयोजन कमजोर पड़ा और गणेश पूजा धीरे-धीरे लोगों के घरों तथा व्यक्तिगत धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित होती चली गई.
अंग्रेजी हुकूमत के दौर में तिलक ने बदला उत्सव का रूप
19वीं सदी के अंत तक भारत में अंग्रेजी शासन के खिलाफ असंतोष बढ़ रहा था. 1857 के विद्रोह के बाद अंग्रेजों ने भारतीयों के एकजुट होने पर भी कई तरह की पाबंदियां लगाईं. इसी दौर में समाज में सांप्रदायिक तनाव भी बढ़ रहा था. ऐसे समय में लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने 1893 में सार्वजनिक गणेश उत्सव की शुरुआत की. उनका उद्देश्य लोगों को एक ऐसे मंच पर लाना था, जहां वे सामूहिक रूप से त्योहार मना सकें और अपनी संस्कृति से जुड़ सकें.
गणेशोत्सव बना लोगों को जोड़ने का मंच
तिलक की पहल के बाद गणेश उत्सव केवल धार्मिक आयोजन तक सीमित नहीं रहा. सार्वजनिक पंडालों में गणपति की स्थापना होने लगी और अलग-अलग वर्गों के लोग इसमें शामिल होने लगे. पूजा के साथ नाच-गाना, सांस्कृतिक कार्यक्रम और सामूहिक गतिविधियां भी उत्सव का हिस्सा बनीं. इस तरह गणेश उत्सव लोगों को एक साथ आने और अपनी संस्कृति को सार्वजनिक रूप से अभिव्यक्त करने का माध्यम बन गया. धीरे-धीरे यह आयोजन राष्ट्रभक्ति की भावना से भी जुड़ने लगा और स्वतंत्रता संग्राम के दौर में लोगों को एक मंच पर लाने में इसकी भूमिका महत्वपूर्ण रही.
आज के भव्य गणेश पंडालों की नींव यहीं से पड़ी
आज गणेश उत्सव के दौरान देशभर में बड़े-बड़े पंडाल बनाए जाते हैं. विशाल प्रतिमाएं स्थापित होती हैं और दर्शन के लिए दूर-दूर से श्रद्धालु पहुंचते हैं. मुंबई का लालबागचा राजा इसका सबसे चर्चित उदाहरण है, जहां हर साल बड़ी संख्या में भक्त दर्शन के लिए पहुंचते हैं. सार्वजनिक पंडालों में गणपति की स्थापना और समाज के अलग-अलग वर्गों की सामूहिक भागीदारी ने गणेश उत्सव को एक व्यापक जनपर्व का रूप दिया. महाराष्ट्र में इसकी खास पहचान बनी रही और समय के साथ यह परंपरा देश के दूसरे हिस्सों तक भी पहुंचती गई.
सदियों पुरानी परंपरा से आज के 11 दिवसीय उत्सव तक
गणेश उत्सव का मौजूदा स्वरूप अचानक नहीं बना. इसकी यात्रा धार्मिक परंपरा से शुरू होकर मराठा शासन, पेशवाओं के राजसी संरक्षण और फिर लोकमान्य तिलक के सार्वजनिक आयोजन तक पहुंची. इसी सफर ने गणेशोत्सव को ऐसा रूप दिया, जिसमें पूजा के साथ सामाजिक और सांस्कृतिक भागीदारी भी जुड़ गई. आज यह उत्सव महाराष्ट्र के साथ-साथ देश के कई हिस्सों में बड़े उत्साह से मनाया जाता है. गणपति की स्थापना से लेकर विसर्जन तक चलने वाला यह पर्व श्रद्धा, संस्कृति और सामूहिक उत्सव की भावना को एक साथ सामने लाता है.