Pitru Paksha 2026: सनातन धर्म में पितृपक्ष का विशेष महत्व माना जाता है. इस दौरान लोग अपने पूर्वजों को याद करते हैं और उनकी आत्मा की शांति के लिए श्राद्ध, तर्पण, पिंडदान और दान-पुण्य करते हैं. इस साल पितृपक्ष की शुरुआत 26 सितंबर से हुई है. इस दौरान कौवे को श्राद्ध का भोजन कराने की परंपरा भी निभाई जाती है.
कौवे को भोजन कराने की क्या है मान्यता?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, कौवे को पितरों और यमराज से जुड़ा माना जाता है. कहा जाता है कि पितृपक्ष के दौरान पूर्वज कौवे के रूप में धरती पर आ सकते हैं और उनके लिए अर्पित भोजन स्वीकार करते हैं. इसलिए श्राद्ध के भोजन का एक हिस्सा कौवे को खिलाया जाता है. मान्यता है कि जब कौवा श्राद्ध का भोजन ग्रहण करता है तो इसे पितरों तक भोजन पहुंचने का संकेत माना जाता है. कई जगहों पर श्राद्ध के भोजन में कौवे के साथ गाय, कुत्ते, चींटी और देवताओं के लिए भी भोग निकाला जाता है. हालांकि, ये धार्मिक मान्यताएं हैं और इन्हें आस्था के रूप में देखा जाता है.
यमराज के संदेशवाहक से जुड़ी मान्यता
धार्मिक ग्रंथों और परंपराओं में कौवे को यमराज का संदेशवाहक बताया गया है. इसी वजह से पितृपक्ष में कौवे को भोजन कराने की परंपरा को विशेष महत्व दिया जाता है. लोगों का विश्वास है कि इससे पितरों का आशीर्वाद परिवार पर बना रहता है और उन्हें शांति मिलती है.
क्या है कौवे से जुड़ी पौराणिक कथा?
एक प्रचलित कथा के अनुसार, भगवान इंद्र के पुत्र जयंत ने कौवे का रूप धारण किया था. कथा में बताया जाता है कि उन्होंने माता सीता के पैर में चोंच मार दी थी. इससे नाराज होकर भगवान श्रीराम ने तिनके का बाण चलाया. जयंत अपनी रक्षा के लिए कई जगह गए, लेकिन उन्हें कहीं सहायता नहीं मिली. आखिरकार उन्होंने श्रीराम से क्षमा मांगी. कथा के अनुसार, श्रीराम ने उन्हें क्षमा करते हुए वरदान दिया कि पितृपक्ष में कौवे को दिया गया भोजन पितरों तक पहुंचेगा. इसी मान्यता को कौवे को श्राद्ध का भोजन कराने की परंपरा से जोड़ा जाता है.
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