Tamil Brahmi Inscriptions Egypt: मिस्र की ‘वैली ऑफ किंग्स’ में करीब 2,000 साल पुराने तमिल-ब्राह्मी शिलालेख मिले हैं, जिनमें ‘सिगाई कोर्रन’ नाम के एक तमिल व्यापारी का उल्लेख है. यह खोज बताती है कि प्राचीन भारत और मिस्र के बीच गहरा और सक्रिय व्यापारिक संबंध था.सिर्फ तमिल ही नहीं, बल्कि संस्कृत, प्राकृत और गांधारी-खरोष्ठी लिपि में भी शिलालेख मिले हैं, जिससे साफ होता है कि दक्षिण ही नहीं, बल्कि पश्चिम और उत्तर भारत के व्यापारी भी मिस्र तक पहुंचते थे.
मिस्र के फराओ की कब्रों पर संस्कृत, प्राकृत और तमिल नाम कैसे पहुंचे?
Tamil Brahmi Inscriptions Egypt: इतिहास में हम पढ़ते आए हैं कि प्राचीन भारत और मिस्र के बीच व्यापारिक संबंध थे. लेकिन हाल की एक खोज ने इस रिश्ते को और भी दिलचस्प बना दिया है. मिस्र की मशहूर ‘वैली ऑफ किंग्स’ में करीब 2,000 साल पुराने तमिल-ब्राह्मी शिलालेख मिले हैं. इससे पता चलता है कि भारतीय व्यापारी सिर्फ समुद्री बंदरगाहों तक ही सीमित नहीं थे, बल्कि वे मिस्र के अंदरूनी इलाकों तक भी जाते थे.इन शिलालेखों में एक नाम खास तौर पर सामने आया है -‘सिगाई कोर्रन’. माना जा रहा है कि यह एक तमिल व्यापारी था, जिसने वहां के कई शाही मकबरों की दीवारों पर अपना नाम उकेरा था.
स्विट्जरलैंड और फ्रांस के शोधकर्ताओं ने इन शिलालेखों का अध्ययन किया. उनके अनुसार, यह नाम छह में से पांच मकबरों में अलग-अलग जगहों पर मिला. इसका मतलब है कि वह व्यक्ति एक बार नहीं, बल्कि कई जगह गया था.तमिल भाषा में ‘सिगाई’ का मतलब मुकुट या शिखर और ‘कोर्रन’ का मतलब नेता या शासक माना जाता है. एक जगह पर ऐसा वाक्य भी मिला जिसका अर्थ लगभग यह निकलता है -‘वह आया और उसने देखा.’ इससे अंदाजा लगाया जा रहा है कि व्यापारी ने शायद वहां की प्रसिद्ध कब्रों को देखने के बाद यह निशान छोड़ा हो.कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि उसे ग्रीक भाषा की जानकारी भी रही होगी, क्योंकि उसने वहां मौजूद ग्रीक शिलालेखों की शैली से मिलती-जुलती तरह में अपना नाम लिखा.
पहले तक जो सबूत मिले थे, वे ज़्यादातर मिस्र के समुद्री तटों तक सीमित थे. लेकिन अब जब शिलालेख मिस्र के अंदरूनी और ऐतिहासिक स्थलों पर मिले हैं, तो यह साफ हो गया है कि भारतीय व्यापारी सिर्फ सामान बेचने-खरीदने नहीं आते थे.वे वहां की संस्कृति, वास्तुकला और इतिहास में भी रुचि लेते थे. संभव है कि वे लंबी दूरी तय करके शाही मकबरों को देखने पहुंचे हों. यानी प्राचीन दौर में व्यापार के साथ-साथ यात्रा और सांस्कृतिक आदान-प्रदान भी हो रहा था.
कुल मिलाकर लगभग 30 शिलालेख पाए गए हैं. इनमें से ज्यादातर तमिल में हैं, लेकिन कुछ संस्कृत, प्राकृत और गांधारी-खरोष्ठी लिपि में भी मिले हैं.इससे संकेत मिलता है कि सिर्फ दक्षिण भारत ही नहीं, बल्कि पश्चिमी और उत्तर-पश्चिम भारत के व्यापारी भी उस समय मिस्र तक पहुंच रहे थे. एक संस्कृत लेख में पश्चिमी भारत के एक राजवंश के दूत का जिक्र भी बताया गया है, जो पहली शताब्दी ईस्वी के आसपास वहां गया था.
अब तक आम धारणा यह थी कि रोमन और मिस्री व्यापारी भारत आते थे. लेकिन इन खोजों से यह साफ हो रहा है कि भारतीय व्यापारी भी उतनी ही सक्रियता से बाहर की दुनिया में जा रहे थे.यह खोज इस बात का प्रमाण मानी जा रही है कि भारत और मिस्र के बीच सिर्फ एकतरफा नहीं, बल्कि दोतरफा व्यापार और सांस्कृतिक संपर्क था. भारतीय व्यापारी समुद्र पार कर न सिर्फ सौदा करते थे, बल्कि अपनी भाषा और पहचान के निशान भी वहां छोड़ जाते थे.
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