क्या आपने कभी सोचा है कि समुद्र में हजारों टन माल ढ़ोने वाले बड़े-बड़े जहाज किस फ्यूल पर चलते हैं? क्या इनमें भी डीजल-पैट्रोल डलता है या फिर कुछ और. क्या इसमें भी ऐरोप्लेन वाला जेट फ्यूल इस्तेमाल होता है? जानें इन सभी सवालों के जवाब-
'स्ट्रेट ऑफ हॉर्मूज' से निकलने वाले जहाजों में कौन-सा तेल डलता है? आखिर क्या है शिप की 'तेज स्पीड' का सीक्रेट!
अमेरिका की पाबंदियों के बावजूद ईरानी कच्चे तेल से लदे तेल के टैंकर धड़ाधड़ ‘स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज’ को पार कर रहे हैं. इनमें से कई जहाज तो अपनी तेज गति के चलते कम समय में ही गतंव्य तक पहुंच चुके हैं. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि समुद्र की लहरों को चीरते हुए आगे बढ़ने वाले ये जहाज आखिर किस फ्यूल से चलते हैं? हर सिर्फ मालवाहन जहाजों की बात नहीं कर रहे, इनमें क्रूज भी शामिल हैं, जो हजारों टन सामान और हजारों की संख्या में लोगों को एक साथ ट्रेवल करने की क्षमता रखते हैं. जानिए जहाजों को चलाने वाली असली ताकत के बारे में-
आजतक की एक रिपोर्ट के मुताबिक, समुद्र में हजारों टन वजन ढ़ोने वाले बड़े-बड़े जहाजों में हैवी फ्यूल का इस्तेमाल किया जाता है. इसे बंकर फ्यूल के नाम से भी जानते हैं, जो कार, बाइक और एरोप्लेन जैसे वाहनों में नहीं डलता और न ही डीजल और पैट्रोल जैसा होता है. इसका सोर्स है कच्चे तेल की रिफाइनिंग के बाद बचा हुआ गाढ़ा और भारी तेल.
दरअसल, तेल की रिफाइनरी में जब कच्चे तेल की प्रोसेसिंग की जाती है तो पेट्रोल, डीजल, केरोसीन और जेल फ्यूल जैसे हल्के तेल प्राप्त होते हैं, जिन्हें अलग-अलग वाहनों में ईंधन के तौर पर इस्तेमाल किया जा सकता है, लेकिन इन सबको निकालने के बाद भारी और गाढ़ा तेल बच जाता है. भारी मालवाहक और क्रूज जहाजों की तेज स्पीड के पीछे इसी का हाथ है.
आपको बता दें कि हैवी फ्यूल, रिफाइन किए हुए तेल का बचा हुआ पार्ट होता है. इसका कुछ खास इस्तेमाल भी नहीं होता, इसलिए ये जहाजों को सस्ता कीमतों पर मिल जाता है. इसे जिन टैंकरों में स्टोर करते हैं वो काफी बड़े होते हैं. इन टैंकरों को बंकर कहा जाता है, इसलिए इस तेल का नाम बंकर ऑइल भी है.
पानी के जहाजों में लगे ज्यादातर इंजन कई बार 4 मंजिला बिल्डिंग जितने बड़े-बड़े होते हैं. ये इतने तेज होते हैं कि भारी-भारी जहाज को तेज स्पीड पर आगे बढ़ा सकते हैं. इस काम में हैवी फ्यूल मददगार साबित होता है.
ये बड़े इंजन हैवी फ्यूल को आसानी से खर्च कर लेते हैं, जो साधारण वाहन के बसकी बात नहीं है. हालांकि ये हैवी फ्यूल भी सीधे इंजन में डलता.
हैवी ऑइल सस्ता तो है, लेकिन ये ज्यादा धुआं भी पैदा करता है, इसलिए पानी के जहाजों में एलएनजी, लो सल्फर फ्यूल, बायोफ्यूल जैसे ईंधन भी इस्तेमाल किए जाने लगे हैं. बात करें इसकी खपत की तो आजतक की रिपोर्ट के मुताबिक, एक बार की यात्रा में एक कंटेनर जहाज 150 से 250 टन तक ईंधन खर्च कर देता है. कई बार जहाज की गति बढ़ने पर ईंधन की खपत भी ज्यादा होती है.
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