मूरथल के ढाबों पर नहीं मिलता नॉनवेज? बाबा काली नाथ की चेतावनी से डरते हैं लोग, क्यों शुरू हुई परंपरा
Murthal Dhabas Story: दिल्ली-एनसीआर में लोग पराठे खाने की जब भी चर्चा करते हैं, तो सबसे पहले मूरथल के ढाबों का नाम आता है. लोग अक्सर वीकेंड पर मूरथल जाकर पराठों का मज़ा ले सकते हैं. अगर आप अपने दोस्तों या पार्टनर के साथ लॉन्ग ड्राइव पर जाना चाहते हैं और पराठों का मजा लेना चाहते हैं, तो मूरथल जाना आपके लिए बेस्ट ऑप्शन हो सकता है. रात के दो बजे हों, या फिर सुबह के 8, इस हाईवे पर आपको गाड़ियों की बड़ी संख्या और देसी मक्खन की खुशबू आती रहती है. एक समय पर मूरथल गाड़ियों के ड्राइवरों के आराम करने का ठिकाना हुआ करता था. अब ये जगह फूड लवर्स के लिए बेस्ट है.
मूरथल में खाने की खुशबू
जब भी मूरथल का नाम आता है, तो वहां के ढाबों से आने वाली देसी पंजाबी खुशबू और उन पराठों का स्वाद जुबान पर दौड़ जाता है. उन ढाबों पर पराठों से लेकर चटनी, अचार और मक्खन सब कुछ लगभग पंजाबी स्टाइल का होता है.
क्या है खाने की खासियत?
यहां पर तंदूर के सिके आलू, गोभी, प्याज और पनीर जैसे तरह-तरह के पराठों के ऊपर डाला जाने वाला मक्खन काफी खुशबूदार और स्वादिष्ट होता है. इसके अलावा यहां मिलने वाली ठंडी लस्सी शरीर से लेकर दिल तक तृप्त कर देती है.
पराठों के साथ दूसरी डिशेज
मूरथल पराठों के लिए फेमस तो है, लेकिन वहां पर कई और डिशेज भी मिलती हैं. पराठों के मामलों में यहां आलू, प्याज, गोभी, पनीर समेत तमाम पराठे खा सकते हैं. इसके अलावा तरह-तरह की डिशेज भी मिलती हैं. इन्हें खाकर लोग उंगलियां चाटते रह जाते हैं लेकिन मूरथल के ढाबों पर नॉनवेज नहीं मिलता.
क्यों नहीं मिलता नॉनवेज?
अब सवाल ये आता है कि आखिर मूरथल के ढाबों पर नॉनवेज क्यों नहीं मिलता? दरअसल, कहा जाता है कि मूरथल में नॉनवेज न मिलने की पुरानी मान्यता है.
क्या है कहानी?
कहा जाता है कि यहां बाबा काली नाथ नाम के एक संत हुआ करते थे. उन्होंने इस इलाके को शुद्ध शाकाहारी रहने की बात कही थी. बाबा काली नाथ मानते थे कि शुद्ध शाकाहारी भोजन ही सही होता है.
बाबा काली नाथ की चेतावनी
स्थानीय लोगों की मानें, तो बाबा कालीनाथ ने मुरथल के लोगों को चेतावनी भी दी थी. उन्होंने कहा था कि यहां पर अगर कोई नॉनवेज बनाएगा या बेचेगा, तो उसका ढाबा बंद हो जाएगा.
सालों से कायम है परंपरा
लोगों को इस बात का यकीन हो गया और लोग आज भी इस पर यकीन करते हैं. लोगों की आस्था के कारण ये परंपरा सालों से कायम है. वहीं ढाबे आज भी नॉनवेज न बनाते हैं और न ही परोसते हैं.