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Mayawati: किसकी बनेगी बात, किसका बिगड़ेगा खेल? UP समेत 3 राज्यों में मायावती के ‘एकला चलो’ के क्या हैं मायने!

UP Assembly Elections 2027: UP, पंजाब और उत्तराखंड में अकेले चुनाव लड़ेंगी मायावती. जानिए BSP के इस 'एकला चलो' दांव से किसे होगा फायदा और किसका बिगड़ेगा सियासी समीकरण.

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Last Updated: 2026-08-25 15:56:36

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बहुजन समाज पार्टी (BSP) प्रमुख मायावती ने एक बार फिर अकेले मैदान में उतरने का बड़ा ऐलान किया है. बसपा आगामी उत्तर प्रदेश, पंजाब और उत्तराखंड विधानसभा चुनावों में किसी भी दल के साथ गठबंधन नहीं करेगी. मायावती का यह फैसला ऐसे समय में आया है जब सभी प्रमुख राजनीतिक दल दलित और पिछड़े वर्ग के वोटों को साधने में पूरी ताकत लगा रहे हैं.

उत्तर प्रदेश में क्यों अहम है मायावती का यह कदम?

इसका सबसे बड़ा असर उत्तर प्रदेश में देखने को मिल सकता है, जहां 2027 के विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी (BJP) का मुकाबला समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के मजबूत गठबंधन से होने जा रहा है. अखिलेश यादव पहले ही साफ कर चुके हैं कि SP और कांग्रेस मिलकर चुनाव लड़ेंगी.

ऐसे में अगर बसपा अकेले चुनाव लड़ती है, तो वह भाजपा विरोधी वोटों को बांट सकती है. इसका सीधा फायदा कई सीटों पर भाजपा को मिल सकता है. हालांकि, दूसरी तरफ बसपा भाजपा के पास गए दलित वोटों में भी सेंध लगा सकती है, जिससे भाजपा को भी नुकसान हो सकता है.

समाजवादी पार्टी के लिए सबसे बड़ी चुनौती

मायावती की यह आक्रामक रणनीति समाजवादी पार्टी के लिए सबसे ज्यादा चिंता बढ़ाने वाली है. कभी बसपा का दलित वोट बैंक बेहद मजबूत माना जाता था, लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव में बसपा का वोट प्रतिशत गिरकर 9.39% पर आ गया था और उसे यूपी में एक भी सीट नहीं मिली थी. अगर बसपा अपने इस वोट बैंक को थोड़ा भी वापस जुटाने में कामयाब होती है, तो कड़े मुकाबले वाली सीटों पर SP-कांग्रेस गठबंधन को बड़ा नुकसान उठाना पड़ सकता है.

कांग्रेस पर क्या पड़ेगा असर?

कांग्रेस भी दलित वोट बैंक को दोबारा अपने साथ जोड़ने की कोशिश कर रही है. मायावती के अकेले मैदान में होने से कांग्रेस के हिस्से आने वाले कुछ वोट कट सकते हैं. हालांकि, अगर मुकाबला त्रिकोणीय हो जाता है, तो कुछ सीटों पर भाजपा या सपा के कमजोर होने का अप्रत्यक्ष फायदा कांग्रेस को मिल सकता है.

नुकसान किसे और फायदा किसको?

इसका जवाब इस बात पर निर्भर करेगा कि किस सीट पर किस पार्टी का मुकाबला कितना कड़ा है. जहां जीत-हार का अंतर बहुत कम होगा, वहां बसपा का थोड़ा सा भी वोट बैंक नतीजों को पलट सकता है. इस लिहाज से मायावती किसी गठबंधन साझेदार के बजाय वोट काटने वाले दल के रूप में ज्यादा बड़ी भूमिका निभा सकती हैं.

क्या खोई जमीन वापस पाएगी बसपा?

मायावती का अकेले चुनाव लड़ने का यह फैसला सिर्फ इन तीन राज्यों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह बसपा को एक स्वतंत्र और मजबूत राजनीतिक ताकत के रूप में फिर से खड़ा करने की कोशिश है. अब इसका नुकसान भाजपा, सपा या कांग्रेस में से किसे सबसे ज्यादा होगा, यह इस बात पर तय होगा कि मायावती चुनावों से पहले दलित मतदाताओं का भरोसा जीतने में कितनी कामयाब होती हैं.

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बहुजन समाज पार्टी (BSP) प्रमुख मायावती ने एक बार फिर अकेले मैदान में उतरने का बड़ा ऐलान किया है. बसपा आगामी उत्तर प्रदेश, पंजाब और उत्तराखंड विधानसभा चुनावों में किसी भी दल के साथ गठबंधन नहीं करेगी. मायावती का यह फैसला ऐसे समय में आया है जब सभी प्रमुख राजनीतिक दल दलित और पिछड़े वर्ग के वोटों को साधने में पूरी ताकत लगा रहे हैं.

उत्तर प्रदेश में क्यों अहम है मायावती का यह कदम?

इसका सबसे बड़ा असर उत्तर प्रदेश में देखने को मिल सकता है, जहां 2027 के विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी (BJP) का मुकाबला समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के मजबूत गठबंधन से होने जा रहा है. अखिलेश यादव पहले ही साफ कर चुके हैं कि SP और कांग्रेस मिलकर चुनाव लड़ेंगी.

ऐसे में अगर बसपा अकेले चुनाव लड़ती है, तो वह भाजपा विरोधी वोटों को बांट सकती है. इसका सीधा फायदा कई सीटों पर भाजपा को मिल सकता है. हालांकि, दूसरी तरफ बसपा भाजपा के पास गए दलित वोटों में भी सेंध लगा सकती है, जिससे भाजपा को भी नुकसान हो सकता है.

समाजवादी पार्टी के लिए सबसे बड़ी चुनौती

मायावती की यह आक्रामक रणनीति समाजवादी पार्टी के लिए सबसे ज्यादा चिंता बढ़ाने वाली है. कभी बसपा का दलित वोट बैंक बेहद मजबूत माना जाता था, लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव में बसपा का वोट प्रतिशत गिरकर 9.39% पर आ गया था और उसे यूपी में एक भी सीट नहीं मिली थी. अगर बसपा अपने इस वोट बैंक को थोड़ा भी वापस जुटाने में कामयाब होती है, तो कड़े मुकाबले वाली सीटों पर SP-कांग्रेस गठबंधन को बड़ा नुकसान उठाना पड़ सकता है.

कांग्रेस पर क्या पड़ेगा असर?

कांग्रेस भी दलित वोट बैंक को दोबारा अपने साथ जोड़ने की कोशिश कर रही है. मायावती के अकेले मैदान में होने से कांग्रेस के हिस्से आने वाले कुछ वोट कट सकते हैं. हालांकि, अगर मुकाबला त्रिकोणीय हो जाता है, तो कुछ सीटों पर भाजपा या सपा के कमजोर होने का अप्रत्यक्ष फायदा कांग्रेस को मिल सकता है.

नुकसान किसे और फायदा किसको?

इसका जवाब इस बात पर निर्भर करेगा कि किस सीट पर किस पार्टी का मुकाबला कितना कड़ा है. जहां जीत-हार का अंतर बहुत कम होगा, वहां बसपा का थोड़ा सा भी वोट बैंक नतीजों को पलट सकता है. इस लिहाज से मायावती किसी गठबंधन साझेदार के बजाय वोट काटने वाले दल के रूप में ज्यादा बड़ी भूमिका निभा सकती हैं.

क्या खोई जमीन वापस पाएगी बसपा?

मायावती का अकेले चुनाव लड़ने का यह फैसला सिर्फ इन तीन राज्यों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह बसपा को एक स्वतंत्र और मजबूत राजनीतिक ताकत के रूप में फिर से खड़ा करने की कोशिश है. अब इसका नुकसान भाजपा, सपा या कांग्रेस में से किसे सबसे ज्यादा होगा, यह इस बात पर तय होगा कि मायावती चुनावों से पहले दलित मतदाताओं का भरोसा जीतने में कितनी कामयाब होती हैं.

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