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Sarla Bhatt Murder Case: 1990 की सरला भट्ट एक ऐसा नाम, जिसका जिक्र फिर से शुरू हो चुका है. दिन-दहाड़े अपहरण, गैंगरेप, और उसके बाद बेरहमी से हत्या और फिर, दशकों की चुप्पी. 36 साल बीत जाने के बाद भी, कश्मीरी हिंदू नर्स सरला भट को इंसाफ़ मिलना अभी भी एक दूर का सपना ही बना हुआ है.
स्टेट इन्वेस्टिगेशन एजेंसी (SIA) ने 1990 के सरला भट हत्याकांड की जाँच शुरू कर दी है. लेकिन, अब तक उन्हें सिवाय नाकामी के कुछ नहीं मिला है. आखिर यह मामला है क्या जिसे 2025 में फिर से खोला गया है? सरला भट कौन थीं, और पुलिस की कोशिशों के बावजूद अब तक कोई नतीजा क्यों नहीं निकला है? आइए जानते हैं.
सरला भट कौन थीं?
सरला भट, एक 27 साल की कश्मीरी हिंदू महिला थीं, जो श्रीनगर के शेर-ए-कश्मीर इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (सौड़ा) में नर्स के तौर पर काम करती थीं. वह दक्षिण कश्मीर के अनंतनाग ज़िले में रहती थीं. आतंकवादियों ने उन्हें धमकियां देना शुरू कर दिया था और उनसे नौकरी छोड़ने की मांग कर रहे थे; लेकिन, उन्होंने इन धमकियों को नज़रअंदाज़ करने का फैसला किया और पूरी हिम्मत के साथ अपना काम करती रहीं.
अप्रैल 1990 में, जम्मू और कश्मीर लिबरेशन फ्रंट (JKLF) से जुड़े आतंकवादियों ने उनका अपहरण कर लिया. जाँच में पता चला कि आतंकवादियों ने पहले उनके साथ गैंगरेप किया. उसके बाद, श्रीनगर में उनकी गोलियों से छलनी लाश मिली. यह मामला कश्मीर में आतंकवाद के शुरुआती दौर की सबसे भयानक घटनाओं में से एक है.
कश्मीरी पंडितों का बड़े पैमाने पर पलायन
साल 1990 कश्मीर में उथल-पुथल, बगावत और कश्मीरी पंडितों के बड़े पैमाने पर पलायन का दौर था. आतंकवादी संगठनों ने खास तौर पर अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों को, और साथ ही उन सभी लोगों को निशाना बनाया जिन्हें भारत-समर्थक माना जाता था. इसी उथल-पुथल भरे दौर में सरला भट की हत्या कर दी गई थी, एक ऐसा जुर्म जिसे कई लोग पहले से सोची-समझी हत्याओं की एक कड़ी का हिस्सा मानते हैं.
जांच के दौरान आरोपियों का असहयोग
सरला भट्ट मामले में, SIA ने अपने मुख्य जांच अधिकारी के ज़रिए एक याचिका दायर की, जिसमें सबूत इकट्ठा करने के लिए संदिग्धों पर नार्को-एनालिसिस टेस्ट करने की अनुमति मांगी गई थी. हालांकि, आरोपियों ने ये टेस्ट करवाने से मना कर दिया. जांच एजेंसी के अनुसार, संदिग्ध सहयोग नहीं कर रहे हैं. नतीजतन, एजेंसी ने तर्क दिया कि सच का पता लगाने के लिए वैज्ञानिक तकनीकों का सहारा लेना जरूरी है. हालांकि, आरोपियों की ओर से पेश हुए बचाव पक्ष के वकील ने इस याचिका का ज़ोरदार विरोध किया. उन्होंने तर्क दिया कि लगभग 35 से 36 साल की देरी के बाद ऐसी जांच प्रक्रिया को लागू करना अन्यायपूर्ण होगा.
उन्होंने आगे बताया कि कई आरोपी अब बुज़ुर्ग हैं और गंभीर बीमारियों से पीड़ित हैं, जिससे ऐसे टेस्ट उनके लिए जानलेवा साबित हो सकते हैं. इस अनुरोध को करने में हुई देरी और आरोपियों की स्वास्थ्य स्थिति, दोनों का गंभीरता से संज्ञान लेते हुए, अदालत ने टिप्पणी की कि जांच में सहायता को मौलिक अधिकारों से ज़्यादा प्राथमिकता नहीं दी जा सकती.