वृंदावन के प्रसिद्ध संत प्रेमानंद महाराज ने लगभग 2 सप्ताह के अंतराल के बाद एक बार फिर अपनी पदयात्रा प्रारंभ कर दी है. केली कुंज आश्रम से बाहर निकलने के बाद प्रेमानंद महाराज ने एनआरआई बिल्डिंग के सामने अपने सभी भक्तों को दर्शन दिए. लंबे समय से इंतजार में बैठे श्रद्धालु भावुक हो गए और राधे-राधे के जयकारे लगाने लगे. महाराज जी ने अपने भक्तों के साथ करीब 1 किलोमीटर की पदयात्रा की और वापस अपने आश्रम लौट गए.
40 साल से वृंदावन वास
अपने आध्यामिक जीवन की शुरुआती यात्रा को लेकर प्रेमानंद महाराज ने खुलकर बात की है. उन्होंने बताया कि कैसे 13 साल की उम्र में ब्रह्मचर्य जीवन अपना लिया था और 15 महीने तक काशी में साधना करके समय बिताया. इसके बाद गंगा किनारे कई जगह आश्रय लिया और तपस्या में ली रहे. जब किड़नी रोग का पता चला तो सीधा वृंदावन चले आए, जहां श्री हित गौरांगी शरण जी महाराज से दीक्षा ली.
पिता ने ली पहली परीक्षा
प्रेमानंद महाराज बताते हैं कि वो बेहद कम उम्र में भगवान की भक्ति करने के लिए घर से भाग आए थे तो पिता वापस ले जाने के लिए आए और गुस्सा करने लगे. प्रेमानंद महाराज ने बताया कि पिता जी बड़े शासनयुक्त और धर्मात्मापुरुष थे. जब हमें गीता जी का पाठ करते देखा तो गुस्सा हुए और खड़े होने को कहा. पिता जी ने पूछा कि घर से क्यों भागे? क्या कारण था? जवाब में युवा प्रेमानंद महाराज कहते हैं कि हमें भगवान की भक्ति करनी है.
घर वापसी की जिद पर अड़े पिता
प्रेमानंद महाराज ने बताया कि कैसे उनके पिता घर वापस ले जाने की जिद पर अड़ गए थे.वो बार-बार बोलते रहे कि घर चलो..वहीं भजन करो..खाओ, पिओ…हम भजन नहीं करते क्या? पिता को मनाते हुए उन्होंने कहा कि हम गृहस्थ भजन नहीं करेंगे, आजीवन भगवान भजन करेंगे और घर नहीं जाएंगे.
गले से लगाकर किया विदा
प्रेमानंद महाराज ने बताया कि कैसे उनके पिता जी के लाख कहने पर घर जाने के लिए राजी नहीं हुए तो पिता जी ने खींचकर गले लगा लिया और सिर पर हाथ सहलाते हुए आखिरी बार राम, राम, राम कहते हुए दुलार किया. पिता ने आशीर्वाद दिया कि जहां बैठोगे वहां पुष्प वर्षा होगी. मुसकुराते हुए प्रेमानंद महाराज कहते हैं कि आज जिस गली निकलते हैं वहां फूलों की वर्षा होती है. ये माता-पिता का आशीर्वाद और गुरु चरणों के आश्रय की कृपा है.
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