Gandhari Review: बॉलीवुड में मां और बच्चे के रिश्ते पर कई ऐसी फिल्में बनी हैं, जहां अपने बच्चे को बचाने के लिए मां किसी भी हद तक जाती है. काजोल की ‘मां’, श्रीदेवी की ‘मॉम’ और ऐश्वर्या राय बच्चन की ‘जज़्बा’ में भी मां के संघर्ष को दिखाया गया है. फिल्म में बदले की कहानी दिखाई गई थी. अब तापसी पन्नू की ‘गांधारी’ भी इसी तरह की फिल्म लिस्ट में शामिल हो गई है. फिल्म एक ऐसी मां की कहानी दिखाती है, जो अपनी बेटी को वापस पाने के लिए सिस्टम से लड़ने के साथ-साथ खुद मोर्चा भी संभालती है. हालांकि एक्शन के मामले में फिल्म अच्छी है लेकिन इमोशनल लेवल पर यह उम्मीद पर खरी नहीं उतरती है.
क्या है कहानी?
देवाशीष मखीजा के निर्देशन में बनी ‘गांधारी’ की कहानी बानी यानी तापसी पन्नू के इर्द-गिर्द घूमती है. जॉयपुरा में ट्रेन से सफर के दौरान उसकी बेटी का अपहरण हो जाता है. बेटी को बचाने की कोशिश में बानी घायल हो जाती है. कुछ समय के लिए उसकी आंखों की रोशनी भी चली जाती है. वो अपने पति यानी इश्वाक सिंह के साथ मिलकर वह बेटी की तलाश शुरू करती है लेकिन पुलिस की सुस्ती उसकी परेशानी और बढ़ा देती है.
पुलिस के भरोसे नहीं बैठती बानी
इसी बीच शहर से दूसरी लड़कियों के गायब होने की घटनाएं सामने आने लगती हैं. नया पुलिस अधिकारी मामले की जांच शुरू करता है. हालांकि बानी अब पुलिस के भरोसे बैठने के लिए तैयार नहीं है. वह खुद अपनी बेटी की तलाश में निकल पड़ती है. यहीं से फिल्म में तेजी आती है और तापसी का एक्शन अवतार देखने को मिलता है.
एक्शन अच्छा लेकिन इमोशन कमजोर
फिल्म की सबसे बड़ी कमी इसका मां-बेटी वाला इमोशनल एंगल है. कहानी बानी और उसकी बेटी के रिश्ते को मजबूत इमोशनल आधार बनाना चाहती है. शुरुआती हिस्से में दोनों के रिश्ते को पर्याप्त गहराई नहीं मिलती. ऐसे में जब बेटी गायब होती है और बानी उसके लिए सब कुछ दांव पर लगा देती है, तो दर्शक उस दर्द को उतनी गहराई से महसूस नहीं कर पाते.
विद्या बालन की ‘कहानी’ से तुलना
फिल्म की तुलना कई जगह विद्या बालन की ‘कहानी’ से होती है. ‘कहानी’ में कोलकाता खुद कहानी का अहम हिस्सा बन गया था. उसमें सस्पेंस लगातार दर्शकों को बांधे रखता था. ‘गांधारी’ में जॉयपुरा को रहस्यमयी बनाने की कोशिश तो होती है लेकिन कई घटनाएं जरूरत से ज्यादा आसानी से आगे बढ़ती नजर आती हैं.