महाराष्ट्र में सरकारी आवासीय विद्यालयों (आदिवासी बच्चों के लिए) में छुट्टियां मनाने के बाद लौट रही लड़कियों को कथित तौर पर कक्षाएं शुरू करने से पहले गर्भावस्था परीक्षण से गुजरना पड़ा, जिससे नाबालिग छात्राओं के साथ व्यवहार और उनकी गरिमा को लेकर चिंताएं बढ़ गईं.
खबरों के अनुसार, पोला त्योहार की छुट्टियों के बाद लौट रही 13 वर्ष से अधिक उम्र की लड़कियों को घोटी और कलवान के सरकारी अस्पतालों में चिकित्सा जांच के लिए इंतजार करते देखा गया. बताया जाता है कि छात्राओं द्वारा लाए गए दस्तावेजों में इस आवश्यकता को “चिकित्सा फिटनेस प्रमाण पत्र” बताया गया था, जिस पर अस्पताल की मुहर लगी थी और लिखा था “प्रेग्नेंसी नेगेटिव”.
बार-बार कराये गए प्रेग्नेंसी टेस्ट
खबरों के मुताबिक, सभी नाबालिग लड़कियों को मेडिकल जांच के बाद अस्पतालों से सर्टिफिकेट लेकर निकलते देखा गया. उनकी पहचान और उनके स्कूलों के नाम उनकी निजता की रक्षा के लिए गुप्त रखे गए हैं. छात्राओं ने इस प्रक्रिया को शर्मनाक बताया है और कहा है कि छुट्टी से लौटने के बाद उनसे बार-बार ऐसी परीक्षाएं करवाई गईं. इस कथित प्रथा ने आवासीय स्कूलों में रहने वाली लड़कियों के कल्याण और व्यवहार की निगरानी के तरीके पर सवाल खड़े कर दिए हैं.
आदिवासी अधिकार समूह ने इस प्रथा को बताया अपमान
एल्गर संगठन के भगवान मधे ने इस कथित प्रथा की आलोचना करते हुए इसे आदिवासी गरिमा का अपमान बताया. इस विवाद के चलते राज्य सरकार से यह स्पष्टीकरण देने की मांग भी उठी है कि क्या विद्यालय में लौटने वाले विद्यार्थियों के लिए गर्भावस्था परीक्षण किसी आधिकारिक रूप से स्वीकृत प्रक्रिया का हिस्सा है.
मंत्री ने गर्भावस्था परीक्षणों से किया इनकार
जनजातीय विकास मंत्री प्रोफेसर अशोक उइके ने इस बात से इनकार किया है कि प्रक्रिया के तहत छात्राओं की गर्भावस्था जांच की जा रही है. इन आरोपों और मंत्री के खंडन से यह सवाल उठ रहा है कि छुट्टियों के बाद आवासीय विद्यालयों में लौटने वाली लड़कियों के लिए आधिकारिक तौर पर कौन-सी चिकित्सा जांच अनिवार्य हैं. विभाग से आगे स्पष्टीकरण की प्रतीक्षा है.