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Home > मनोरंजन > जिस कलम पर परिवार ने लगाई थी रोक, उसी ने बना दिया महान; बॉलीवुड को दी कई सुपरहिट गीत

जिस कलम पर परिवार ने लगाई थी रोक, उसी ने बना दिया महान; बॉलीवुड को दी कई सुपरहिट गीत

Gulzar 92th Birthday: गुलजार का असली नाम संपूर्ण सिंह कालरा था. परिवार की नाराजगी के बावजूद उन्होंने लिखना नहीं छोड़ा. मोरा गोरा अंग लई ले से पहचान मिली और उनकी जिंदगी हमेशा के लिए बदल गई.

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Last Updated: August 18, 2026 09:19:37 IST

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Gulzar 92th Birthday: गुलजार सिर्फ शायर नहीं, बल्कि हिंदी सिनेमा की आत्मा माने जाते हैं. जिंदगी, इश्क, तन्हाई और रिश्तों को बेहद खूबसूरत अंदाज में शब्द देने वाले गुलजार आज, 18 अगस्त 2026 को 92 साल के हो गए हैं. हालांकि उनकी इस शानदार पहचान के पीछे संघर्ष की एक लंबी कहानी छिपी है.

संपूर्ण सिंह कालरा ने क्यों बदला नाम?

गुलजार का असली नाम संपूर्ण सिंह कालरा है. उनका जन्म 18 अगस्त 1934 को पंजाब के दीना में हुआ था, जो अब पाकिस्तान के झेलम जिले में है. बचपन में ही मां को खोने के बाद बंटवारे का दर्द भी झेलना पड़ा. परिवार पहले अमृतसर और फिर दिल्ली पहुंचा. बाद में रोजगार की तलाश में संपूर्ण मुंबई चले गए.

पिता को पसंद नहीं था लिखना

संपूर्ण सिंह को बचपन से ही लिखने और शायरी का शौक था, लेकिन उनके पिता माखन सिंह कालरा को यह पसंद नहीं था. उनका मानना था कि शायरी से घर नहीं चलता. पिता चाहते थे कि बेटा काम-धंधे पर ध्यान दे. मुंबई में संपूर्ण ने वर्ली के एक मोटर गैरेज में मैकेनिक के तौर पर काम शुरू किया. दिनभर गाड़ियों पर पेंट करते और हाथों पर ग्रीस लगी रहती, लेकिन दिल में शायरी बसती रही. परिवार की नाराजगी से बचने के लिए उन्होंने अपनी रचनाओं के लिए ‘गुलजार’ नाम अपना लिया. बाद में ‘दीनवी’ भी जोड़ा, जो उनके जन्मस्थान दीना से जुड़ा था.

एक गाने ने बदल दी जिंदगी

गुलजार की मुलाकात शैलेंद्र और अली सरदार जाफरी जैसे साहित्यकारों से हुई. इसके बाद उन्हें फिल्मकार विमल रॉय तक पहुंचने का मौका मिला. गुलजार ने जब ‘मोरा गोरा अंग लई ले’ के बोल सुनाए, तो उनकी प्रतिभा पहचान ली गई. यहीं से उनके फिल्मी सफर की शुरुआत हुई और फिर उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा.

ये भी देखें: ढूंढ रहे थे बंदूक, मिल गया नोटों का पहाड़, गिनने के लिए मंगानी पड़ी मशीन; आखिर कौन है रकम का असली मालिक?

कई यादगार फिल्में भी दी

निर्देशक के तौर पर ‘आंधी’, ‘मौसम’, ‘इजाजत’ और ‘माचिस’ जैसी यादगार फिल्में दीं. वहीं उनके गीतों ने भी कई पीढ़ियों को अपना दीवाना बनाया. ‘जय हो’ के लिए उन्हें ऑस्कर भी मिला. जिस कलम को कभी परिवार रोकना चाहता था, वही कलम आगे चलकर गुलजार की सबसे बड़ी पहचान बन गई. आज 92 साल की उम्र में भी उनके शब्द उतने ही ताजा और असरदार हैं.

ये भी देखें: Kashmira Shah Post: गोविंदा-सुनीता के बिगड़ते रिश्तों के बीच कश्मीरा का पोस्ट वायरल, प्यार पर उठाया सवाल

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Gulzar 92th Birthday: गुलजार सिर्फ शायर नहीं, बल्कि हिंदी सिनेमा की आत्मा माने जाते हैं. जिंदगी, इश्क, तन्हाई और रिश्तों को बेहद खूबसूरत अंदाज में शब्द देने वाले गुलजार आज, 18 अगस्त 2026 को 92 साल के हो गए हैं. हालांकि उनकी इस शानदार पहचान के पीछे संघर्ष की एक लंबी कहानी छिपी है.

संपूर्ण सिंह कालरा ने क्यों बदला नाम?

गुलजार का असली नाम संपूर्ण सिंह कालरा है. उनका जन्म 18 अगस्त 1934 को पंजाब के दीना में हुआ था, जो अब पाकिस्तान के झेलम जिले में है. बचपन में ही मां को खोने के बाद बंटवारे का दर्द भी झेलना पड़ा. परिवार पहले अमृतसर और फिर दिल्ली पहुंचा. बाद में रोजगार की तलाश में संपूर्ण मुंबई चले गए.

पिता को पसंद नहीं था लिखना

संपूर्ण सिंह को बचपन से ही लिखने और शायरी का शौक था, लेकिन उनके पिता माखन सिंह कालरा को यह पसंद नहीं था. उनका मानना था कि शायरी से घर नहीं चलता. पिता चाहते थे कि बेटा काम-धंधे पर ध्यान दे. मुंबई में संपूर्ण ने वर्ली के एक मोटर गैरेज में मैकेनिक के तौर पर काम शुरू किया. दिनभर गाड़ियों पर पेंट करते और हाथों पर ग्रीस लगी रहती, लेकिन दिल में शायरी बसती रही. परिवार की नाराजगी से बचने के लिए उन्होंने अपनी रचनाओं के लिए ‘गुलजार’ नाम अपना लिया. बाद में ‘दीनवी’ भी जोड़ा, जो उनके जन्मस्थान दीना से जुड़ा था.

एक गाने ने बदल दी जिंदगी

गुलजार की मुलाकात शैलेंद्र और अली सरदार जाफरी जैसे साहित्यकारों से हुई. इसके बाद उन्हें फिल्मकार विमल रॉय तक पहुंचने का मौका मिला. गुलजार ने जब ‘मोरा गोरा अंग लई ले’ के बोल सुनाए, तो उनकी प्रतिभा पहचान ली गई. यहीं से उनके फिल्मी सफर की शुरुआत हुई और फिर उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा.

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कई यादगार फिल्में भी दी

निर्देशक के तौर पर ‘आंधी’, ‘मौसम’, ‘इजाजत’ और ‘माचिस’ जैसी यादगार फिल्में दीं. वहीं उनके गीतों ने भी कई पीढ़ियों को अपना दीवाना बनाया. ‘जय हो’ के लिए उन्हें ऑस्कर भी मिला. जिस कलम को कभी परिवार रोकना चाहता था, वही कलम आगे चलकर गुलजार की सबसे बड़ी पहचान बन गई. आज 92 साल की उम्र में भी उनके शब्द उतने ही ताजा और असरदार हैं.

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