Gujrat: इस साल 13 मई की रात दक्षिण गुजरात के एक परिवार ने अपनी जिंदगी के सबसे बड़े दुख के बीच ऐसा फैसला लिया, जिससे तीन अनजान लोगों की जान बच गई. वांसदा तालुका के महुवास गांव के 40 साल के अतुलभाई गामित को बेहद गंभीर हालत में धरमपुर के श्रीमद् राजचंद्र हॉस्पिटल एंड रिसर्च सेंटर की इमरजेंसी में लाया गया. सीटी स्कैन में पता चला कि उनके दिमाग में गंभीर ब्लीडिंग (ब्रेन हेमरेज) हुई है. आईसीयू की टीम ने तुरंत इलाज शुरू किया, लेकिन उन्हें बचाया नहीं जा सका. तय मेडिकल और कानूनी प्रक्रिया के अनुसार उन्हें ब्रेन डेड घोषित कर दिया गया. किसी भी परिवार के लिए यह सबसे मुश्किल घड़ी होती है. लेकिन इसी घड़ी में गामित परिवार ने अतुलभाई के सभी अंग दान करने के लिए हां कह दी. ऑर्गन डोनेशन में सबसे बड़ी चुनौती होती है समय. शरीर से निकालने के बाद हर अंग को कुछ ही घंटों के अंदर मरीज तक पहुंचाना होता है. दिल के मामले में यह वक्त सबसे कम होता है. हॉस्पिटल की टीमों ने इसी समय के भीतर अंग निकालने और उन्हें भेजने का पूरा इंतजाम किया. अतुलभाई का दिल ग्रीन कॉरिडोर बनाकर सड़क के रास्ते दमन एयरपोर्ट पहुंचाया गया और वहां से फ्लाइट से अहमदाबाद भेजा गया. उनकी दोनों किडनी एम्बुलेंस से अहमदाबाद के किडनी इंस्टीट्यूट पहुंचाई गईं.एक परिवार के एक फैसले से तीन मरीजों को नई जिंदगी मिल गई.
पूरे इलाके में पहली बार
श्रीमद् राजचंद्र हॉस्पिटल में यह पहला ऑर्गन डोनेशन था, और पूरे इलाके के लिए भी यह पहली बार था. ब्रेन डेड मरीज की पहचान, परिवार की सहमति, अंगों को सुरक्षित निकालना और फिर उन्हें सैकड़ों किलोमीटर दूर वक्त पर पहुंचाना, ये सब आमतौर पर बड़े शहरों के बड़े हॉस्पिटल्स में ही होता है.
अतुलभाई को विदा करते हुए हॉस्पिटल ने उन्हें गार्ड ऑफ ऑनर दिया और उनके परिवार का दिल से शुक्रिया अदा किया.
जिस एयरपोर्ट से उड़ा दिल
जिस दमन एयरपोर्ट से अतुलभाई का दिल अहमदाबाद के लिए रवाना हुआ, वह अब इस इलाके के लिए और भी अहम हो गया है. 5 जून को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दमन में नमो एयरपोर्ट की नई टर्मिनल बिल्डिंग का उद्घाटन किया. नए टर्मिनल में एक साथ करीब 180 यात्रियों के बैठने की जगह है. यह करीब 2,970 करोड़ रुपये के विकास प्रोजेक्ट्स का हिस्सा था, जिसमें हेल्थ, टूरिज्म, इंफ्रास्ट्रक्चर और कनेक्टिविटी से जुड़े काम शामिल हैं. ऑर्गन डोनेशन में हर मिनट कीमती होता है. ऐसे में धरमपुर, वलसाड और आसपास के इलाकों के लिए बेहतर हवाई कनेक्टिविटी आगे चलकर कई और जिंदगियां बचाने में मदद कर सकती है.
500 से ज्यादा गांवों का हॉस्पिटल
जिस हॉस्पिटल में यह हुआ, वह कोई बड़े कॉर्पोरेट का अस्पताल नहीं है. श्रीमद् राजचंद्र हॉस्पिटल 250 बेड का मल्टी-स्पेशियलिटी चैरिटेबल हॉस्पिटल है, जहां 500 से ज्यादा गांवों के लोगों का इलाज मुफ्त या बहुत कम खर्च में होता है. एसआरएलसी के मुताबिक, इस इलाके में बच्चों की ओपन-हार्ट सर्जरी करने वाला यह अकेला हॉस्पिटल है. इसके नवजात शिशुओं के आईसीयू (एनआईसीयू) में अब तक 8,000 से ज्यादा नवजातों का इलाज हो चुका है.
यह हॉस्पिटल श्रीमद् राजचंद्र मिशन धरमपुर की सेवा शाखा श्रीमद् राजचंद्र लव एंड केयर मैं शामिल है. मिशन की शुरुआत पूज्य गुरुदेवश्री राकेशजी ने 1994 में की थी. मिशन बताता है कि गुरुदेवश्री ने साफ कहा था: गांव के लोगों के लिए ऐसा हॉस्पिटल बनाओ, जहां तुम खुद भी अपना इलाज कराना चाहो.
दस साल से चल रही मुहिम
ऑर्गन डोनेशन को लेकर श्रीमद् राजचंद्र लव एंड केयर का काम नया नहीं है. संस्था ने 2016 में वैलेंटाइन डे के दिन अपना ऑर्गन डोनेशन प्रोग्राम शुरू किया था. मिशन के मुताबिक इस मुहिम के जरिए 150 शहरों में 10 लाख से ज्यादा लोगों तक अंगदान का मैसेज पहुंचाया गया. मुंबई के जोनल ट्रांसप्लांट कोऑर्डिनेशन सेंटर (ZTCC) ने इस काम के लिए संस्था को सम्मानित भी किया था. लेकिन लोगों को जागरूक करना एक बात है, और अपने ही हॉस्पिटल में ऑर्गन डोनेशन की पूरी प्रक्रिया करके दिखाना दूसरी. महुवास गांव के गामित परिवार की हिम्मत से यह मुमकिन हुआ.
एक परिवार, जो मिसाल बन गया
गांवों में मौत से जुड़ी परंपराएं और मान्यताएं गहरी होती हैं. ऐसे में किसी अपने के अंग दान करने का फैसला लेना आसान नहीं होता. इसलिए अतुलभाई के परिवार का यह कदम और भी बड़ा है. यह आसपास के गांवों में अंगदान को लेकर लोगों की सोच बदलने की शुरुआत बन सकता है.अतुलभाई अब इस दुनिया में नहीं हैं. लेकिन उनका दिल किसी और के सीने में धड़क रहा है, और दो लोग उनकी किडनी की बदौलत नई जिंदगी जी रहे हैं. धरमपुर के लिए यह सिर्फ एक हॉस्पिटल की पहली कामयाबी नहीं, बल्कि एक परिवार के बड़े दिल की कहानी है.