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18 साल से कम उम्र के बच्चे नहीं चला सकेंगे सोशल मीडिया, केंद्र सरकार करेगी बदलाव

Social Media Ban for Minors: सोशल मीडिया इस्तेमाल करने वाले बच्चों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए बड़ा कदम उठाने का फैसला लिया है. सरकार विचार कर रही है कि 18 साल से कम उम्र के बच्चे सोशल मीडिया का इस्तेमाल नहीं कर सकेंगे.

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Last Updated: September 29, 2026 15:23:54 IST

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Social Media Ban for Minors: सोशल मीडिया इस्तेमाल करने वाले बच्चों की सुरक्षा को लेकर केंद्र सरकार बड़ा कदम उठा सकती है. टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, केंद्र ने सोमवार को सुप्रीम कोर्ट को बताया कि वह इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी (इंटरमीडियरी गाइडलाइंस एंड डिजिटल मीडिया एथिक्स कोड) रूल्स में बदलाव करने पर विचार कर रहा है. इसके तहत 18 साल से कम उम्र के बच्चों को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर अकाउंट बनाने से रोका जा सकता है.

यह मामला बच्चों के ऑनलाइन अधिकारों और उनकी सुरक्षा से जुड़ी एक याचिका की सुनवाई के दौरान सामने आया. चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्य कांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची और वी. मोहना की बेंच ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर नाबालिगों की सुरक्षा को लेकर सवाल उठाए.

याचिकाकर्ता ने दी ये दलील

याचिकाकर्ता NGO जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रन अलायंस की ओर से सीनियर एडवोकेट एच.एस. फूलका ने दलील दी कि जब भारतीय कानून नाबालिगों को कॉन्ट्रैक्ट करने के लिए सक्षम नहीं मानता, तो वे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की शर्तें स्वीकार कर अकाउंट कैसे बना सकते हैं. केंद्र की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने भी कहा कि नाबालिगों और सोशल मीडिया इंटरमीडियरीज के बीच ऐसे समझौते कानूनी रूप से मान्य नहीं माने जाने चाहिए. उन्होंने बताया कि सरकार इस मामले की जांच कर उचित कदम उठाएगी.

माता-पिता की सहमति का प्रावधान

सरकार ने साफ किया कि शैक्षणिक वेबसाइटों या ऐसी जरूरी डिजिटल सेवाओं के लिए माता-पिता की सहमति के जरिए सदस्यता लेने की व्यवस्था अलग हो सकती है. वहीं सोशल मीडिया अकाउंट खोलने के मामले में प्लेटफॉर्म्स के लिए नियमों को कानूनी तौर पर अनिवार्य बनाया जा सकता है. कोर्ट ने भी केवल कंपनियों के स्वैच्छिक सुरक्षा उपायों के बजाय एक स्पष्ट कानूनी ढांचे की जरूरत बताई है. बेंच ने केंद्र से यह विचार करने को कहा कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को भारतीय कानूनों के मुताबिक अपनी तकनीक और सॉफ्टवेयर में जरूरी बदलाव करने के निर्देश दिए जा सकते हैं या नहीं.

बच्चों की सुरक्षा चिंता का विषय?

याचिका में बच्चों को ऑनलाइन ग्रूमिंग, यौन शोषण, साइबर बुलिंग, निजी डेटा के गलत इस्तेमाल, व्यवहार की प्रोफाइलिंग और उम्र के अनुकूल न होने वाले कंटेंट जैसी समस्याओं से बचाने की मांग की गई है. याचिकाकर्ता ने पूरी तरह इंटरनेट पर रोक लगाने के बजाय उम्र की पुष्टि, माता-पिता की सहमति और दूसरे सुरक्षा उपायों की वकालत की है. अब केंद्र सरकार इंटरमीडियरी रूल्स में संभावित बदलावों पर विचार कर रही है. अगर नियमों में संशोधन किया जाता है, तो सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के लिए नाबालिगों के अकाउंट को लेकर नई कानूनी जिम्मेदारियां तय हो सकती हैं.

ये भी पढ़ें: Bank Unions Strike: रविवार को भी किया काम और हड़ताल भी हो गई कैंसिल! सोशल मीडिया पर मीम्स के जरिए छलका बैंक कर्मचारियों का दर्द

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Social Media Ban for Minors: सोशल मीडिया इस्तेमाल करने वाले बच्चों की सुरक्षा को लेकर केंद्र सरकार बड़ा कदम उठा सकती है. टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, केंद्र ने सोमवार को सुप्रीम कोर्ट को बताया कि वह इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी (इंटरमीडियरी गाइडलाइंस एंड डिजिटल मीडिया एथिक्स कोड) रूल्स में बदलाव करने पर विचार कर रहा है. इसके तहत 18 साल से कम उम्र के बच्चों को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर अकाउंट बनाने से रोका जा सकता है.

यह मामला बच्चों के ऑनलाइन अधिकारों और उनकी सुरक्षा से जुड़ी एक याचिका की सुनवाई के दौरान सामने आया. चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्य कांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची और वी. मोहना की बेंच ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर नाबालिगों की सुरक्षा को लेकर सवाल उठाए.

याचिकाकर्ता ने दी ये दलील

याचिकाकर्ता NGO जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रन अलायंस की ओर से सीनियर एडवोकेट एच.एस. फूलका ने दलील दी कि जब भारतीय कानून नाबालिगों को कॉन्ट्रैक्ट करने के लिए सक्षम नहीं मानता, तो वे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की शर्तें स्वीकार कर अकाउंट कैसे बना सकते हैं. केंद्र की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने भी कहा कि नाबालिगों और सोशल मीडिया इंटरमीडियरीज के बीच ऐसे समझौते कानूनी रूप से मान्य नहीं माने जाने चाहिए. उन्होंने बताया कि सरकार इस मामले की जांच कर उचित कदम उठाएगी.

माता-पिता की सहमति का प्रावधान

सरकार ने साफ किया कि शैक्षणिक वेबसाइटों या ऐसी जरूरी डिजिटल सेवाओं के लिए माता-पिता की सहमति के जरिए सदस्यता लेने की व्यवस्था अलग हो सकती है. वहीं सोशल मीडिया अकाउंट खोलने के मामले में प्लेटफॉर्म्स के लिए नियमों को कानूनी तौर पर अनिवार्य बनाया जा सकता है. कोर्ट ने भी केवल कंपनियों के स्वैच्छिक सुरक्षा उपायों के बजाय एक स्पष्ट कानूनी ढांचे की जरूरत बताई है. बेंच ने केंद्र से यह विचार करने को कहा कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को भारतीय कानूनों के मुताबिक अपनी तकनीक और सॉफ्टवेयर में जरूरी बदलाव करने के निर्देश दिए जा सकते हैं या नहीं.

बच्चों की सुरक्षा चिंता का विषय?

याचिका में बच्चों को ऑनलाइन ग्रूमिंग, यौन शोषण, साइबर बुलिंग, निजी डेटा के गलत इस्तेमाल, व्यवहार की प्रोफाइलिंग और उम्र के अनुकूल न होने वाले कंटेंट जैसी समस्याओं से बचाने की मांग की गई है. याचिकाकर्ता ने पूरी तरह इंटरनेट पर रोक लगाने के बजाय उम्र की पुष्टि, माता-पिता की सहमति और दूसरे सुरक्षा उपायों की वकालत की है. अब केंद्र सरकार इंटरमीडियरी रूल्स में संभावित बदलावों पर विचार कर रही है. अगर नियमों में संशोधन किया जाता है, तो सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के लिए नाबालिगों के अकाउंट को लेकर नई कानूनी जिम्मेदारियां तय हो सकती हैं.

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