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TCS Nashik Case: क्या आरोपी पर महाराष्ट्र के धर्मांतरण विरोधी कानून के तहत आरोप लगाए जा सकते हैं? पुलिस ने क्यों लगाई धारा 299

TCS Nashik Controversy: नासिक टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज़ (TCS) मामले में क्या आरोपी पर महाराष्ट्र के धर्मांतरण विरोधी कानून के तहत आरोप लगाए जा सकते हैं? पुलिस ने इसके बजाय धारा 299 क्यों लगाई? और क्या राज्य का नया धार्मिक कानून इस मामले पर लागू होता है? चलिए विस्तार से समझें.

Written By: Shristi S
Last Updated: 2026-04-18 15:50:18

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TCS Nashik Case Explained: महाराष्ट्र के नासिक टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज़ (TCS) के BPO में एक कथित धर्म-परिवर्तन और उत्पीड़न नेटवर्क का भंडाफोड़ हुआ है, जिसने पूरे देश को हिला कर रख दिया है. कई FIR में 2022 से चल रहे इस सुनियोजित दुर्व्यवहार का विस्तार से ज़िक्र किया गया है.
 
ऐसे में क्या इस मामले में आरोपी पर महाराष्ट्र के धर्मांतरण विरोधी कानून के तहत आरोप लगाए जा सकते हैं? पुलिस ने इसके बजाय धारा 299 क्यों लगाई? और क्या राज्य का नया धार्मिक कानून इस मामले पर लागू होता है? चलिए विस्तार से जानें.
 

TCS नासिक मामले में आरोप, FIR और 17 अप्रैल को क्या हुआ?

पुलिस ने भारतीय न्याय संहिता (BNS) के तहत नौ FIR (8 महिलाओं द्वारा और 1 पुरुष कर्मचारी द्वारा) दर्ज की हैं जिसमें-
 
  • यौन अपराध: बलात्कार (धारा 69), यौन उत्पीड़न (धारा 75), पीछा करना (धारा 78), और लज्जा भंग करना (धारा 79).
  • धार्मिक जबरदस्ती: जबरदस्ती धर्म-परिवर्तन का प्रयास और धार्मिक भावनाओं को आहत करने के जानबूझकर किए गए कृत्य (धारा 299).
पुलिस के अनुसार, पीड़ितों ने बताया कि उन्हें नमाज़ पढ़ने, रमज़ान के रोज़े रखने और अपनी धार्मिक मान्यताओं के विरुद्ध भोजन करने के लिए मजबूर किया गया.
 

मुख्य आरोपी कौन हैं?

इस मामले के मुख्य आरोपी जिसमें दानिश शेख, तौसीफ़ अत्तार, रज़ा रफ़ीक़ मेमन, शाहरुख कुरैशी, शफ़ी शेख और आसिफ़ आफ़ताब अंसारी टीम लीडर है, वहीं इन सबको मैनेज करने वालें में अश्विनी चैननी जो, असिस्टेंट जनरल मैनेजर और POSH समिति की सदस्य; उन पर वर्षों तक कर्मचारियों की शिकायतों को नज़रअंदाज़ करने और दबाने का आरोप है, जिसके चलते उन्हें गिरफ़्तार कर लिया गया है. वहीं निदा खान को पुलिस ने इस मामले में एक अहम कड़ी बताया है; TCS ने उन्हें निलंबित कर दिया है और फ़िलहाल वह अग्रिम ज़मानत की मांग कर रही हैं.
 

जांच

फ़िलहाल कम से कम 7 लोग पुलिस हिरासत में हैं. एक महिला DCP (पुलिस उपायुक्त) के नेतृत्व में 12 सदस्यों वाली एक विशेष जांच टीम (SIT) इस मामले की जांच कर रही है. 40 दिनों तक चले एक गुप्त अभियान के दौरान इन आरोपों की पुष्टि हुई; इस अभियान में महिला पुलिस अधिकारियों ने नए कर्मचारियों का रूप धरकर कार्यालय के भीतर रहकर जांच की थी.
 

17 अप्रैल को क्या हुआ?

निदा खान के लिए आधिकारिक सस्पेंशन लेटर सामने आए, जिनमें कंपनी के सभी सिस्टम तक उनकी पहुंच खत्म कर दी गई थी. निदा खान ने अग्रिम ज़मानत के लिए नासिक कोर्ट का रुख किया, और राहत के लिए अपनी प्रेग्नेंसी और मेडिकल हालत का हवाला दिया. आरोपी शफी शेख और रज़ा मेमन को आगे की पूछताछ के लिए 18 अप्रैल तक पुलिस हिरासत में भेज दिया गया; उनके मोबाइल फ़ोन डिजिटल फ़ॉरेंसिक के लिए ज़ब्त कर लिए गए हैं.
 
TCS ने नासिक यूनिट के सभी कर्मचारियों को निर्देश दिया है कि वे जांच की गहमागहमी के दौरान अपनी सुरक्षा और सुविधा सुनिश्चित करने के लिए अनिश्चित काल तक घर से काम करें. राष्ट्रीय महिला आयोग (NCW) ने एक फैक्ट-फाइंडिंग कमेटी की घोषणा की, जिसकी अगुवाई जस्टिस (रिटायर्ड) साधना जाधव करेंगी; यह कमेटी यूनिट का दौरा करेगी और 10 दिनों के भीतर अपनी रिपोर्ट सौंपेगी. सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की गई, जिसमें धोखे से किए गए जबरदस्ती के धर्मांतरण को राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक गंभीर खतरा मानने के निर्देश देने की मांग की गई; इसमें TCS नासिक मामले को एक मुख्य उदाहरण के तौर पर पेश किया गया.
 

क्या महाराष्ट्र में धर्मांतरण विरोधी कानून है?

महाराष्ट्र धर्म स्वतंत्रता अधिनियम, 2026 (जिसे ‘धर्म स्वातंत्र्य अधिनियम’ भी कहा जाता है) को महाराष्ट्र विधानसभा ने 16 मार्च, 2026 को पारित किया था. इस कानून का मकसद ज़बरदस्ती, धोखाधड़ी, प्रलोभन या सिर्फ़ शादी के मकसद से किए जाने वाले धार्मिक धर्मांतरणों पर रोक लगाना है.
 

क्या है प्रावधान और दंड?

इस अधिनियम के तहत आने वाले अपराध संज्ञेय (cognizable) और गैर-ज़मानती होते हैं. यह अधिनियम अवैध धर्मांतरणों के लिए कड़ी सज़ा का प्रावधान करता है, और कुछ खास मामलों में सज़ा की गंभीरता और बढ़ जाती है:
 
  • सामान्य मामले: 7 साल तक की जेल और ₹1 लाख का जुर्माना.
  • कमज़ोर वर्ग: नाबालिगों, महिलाओं या SC/ST समुदाय के लोगों से जुड़े मामलों में जुर्माना बढ़कर ₹5 लाख हो जाता है.
  • सामूहिक धर्मांतरण: 7 से 10 साल तक की जेल और ₹5 लाख के जुर्माने की सज़ा.
  • बार-बार किए जाने वाले/संस्थागत अपराध: 10 साल तक की जेल, साथ ही ज़्यादा जुर्माना और संबंधित संस्था का रजिस्ट्रेशन रद्द करने का प्रावधान.
 

कानूनी ढांचा

यह अधिनियम राज्य में धार्मिक धर्मांतरणों के लिए एक कड़ा कानूनी ढांचा पेश करता है:
 
  • अनिवार्य सूचना: धर्मांतरण करने के इच्छुक व्यक्तियों को ज़िला मजिस्ट्रेट को 60 दिन पहले इसकी सूचना देना अनिवार्य है.
  •  रूपांतरण के बाद की घोषणा: धर्मांतरण करने वाले व्यक्तियों और आयोजकों को धर्मांतरण समारोह के 21 दिनों के भीतर एक घोषणा पत्र जमा करना होगा.
  • विवाह का रद्द होना: कोई भी विवाह जो केवल गैर-कानूनी धर्मांतरण के उद्देश्य से किया गया हो, उसे अदालत द्वारा शून्य और अमान्य घोषित किया जा सकता है.
  • बच्चों के अधिकार: ऐसे संबंध से पैदा हुए बच्चे को मां के मूल धर्म का अनुयायी माना जाता है, लेकिन उसे माता-पिता दोनों की संपत्ति पर उत्तराधिकार के अधिकार प्राप्त रहते हैं.
  • सबूत का बोझ: यह साबित करने की ज़िम्मेदारी कि धर्मांतरण स्वेच्छा से किया गया था, आरोपी या उस व्यक्ति पर होती है जिसने धर्मांतरण करवाया था.
 

क्या महाराष्ट्र में धर्मांतरण विरोधी कानून लागू है?

यह विधेयक विधानसभा द्वारा पारित कर दिया गया है और कानून बनने के लिए राज्यपाल की मंज़ूरी का इंतज़ार कर रहा है. सत्ताधारी ‘महायुति’ सरकार ने इस कानून को लव जिहाद को रोकने और सामाजिक सद्भाव की रक्षा करने के लिए एक आवश्यक साधन के रूप में प्रस्तुत किया है. आलोचकों और नागरिक अधिकार समूहों का तर्क है कि यह कानून प्रतिगामी है, निजता के अधिकार का उल्लंघन करता है, और अनुच्छेद 25 (धर्म की स्वतंत्रता) का हनन करता है.
 

आरोपियों पर धारा 299 के तहत मामला क्यों दर्ज किया गया है?

BNS की धारा 299 जानबूझकर और दुर्भावनापूर्ण ढंग से किए गए ऐसे कृत्यों से संबंधित है, जिनका उद्देश्य किसी वर्ग के धर्म या धार्मिक विश्वासों का अपमान करके उनकी धार्मिक भावनाओं को आहत करना हो. इसके तहत 3 साल तक की कैद, या जुर्माना, या दोनों का प्रावधान है. इन मामलों की सुनवाई कोई भी मजिस्ट्रेट कर सकता है.
 
TCS नासिक मामले में आरोपियों पर मुख्य रूप से ‘भारतीय न्याय संहिता’ (BNS) की धारा 299 के तहत मामला दर्ज किया गया है, क्योंकि यह धारा विशेष रूप से उन जानबूझकर और दुर्भावनापूर्ण कृत्यों से निपटती है जिनका उद्देश्य धार्मिक भावनाओं को आहत करना होता है. हालांकि आरोपों में जबरदस्ती धर्मांतरण शामिल है, फिर भी विशिष्ट कानूनी आरोप मौजूदा सबूतों और दस्तावेज़ों में दर्ज कृत्यों की विशिष्ट प्रकृति (जैसे देवी-देवताओं के बारे में अपमानजनक टिप्पणियां) के आधार पर चुने जाते हैं.
 

धारा 299 बनाम धर्मांतरण विरोधी कानून

पुलिस ने धार्मिक भावनाओं को आहत करने के तत्काल सबूतों से निपटने के लिए BNS की धारा 299 (जिसने IPC की धारा 295A का स्थान लिया है) का प्रयोग किया है.
 
  • धारा 299 (BNS): शब्दों, संकेतों या दृश्य प्रस्तुतियों के माध्यम से धार्मिक भावनाओं का अपमान करने या उन्हें आहत करने से संबंधित है.
  • धर्मांतरण विरोधी कानून: ‘महाराष्ट्र धर्म स्वतंत्रता अधिनियम 2026’ विशेष रूप से प्रलोभन, ज़ोर-ज़बरदस्ती या विवाह के माध्यम से किए जाने वाले धर्मांतरण को लक्षित करता है.
  • सबूतों का मिलान: दर्ज की गई नौ FIRs में से कई में, पीड़ितों ने हिंदू देवी-देवताओं और शिवलिंग के बारे में आपत्तिजनक टिप्पणियों की शिकायत की है, जो सीधे तौर पर ‘धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने’ (धारा 299) के दायरे में आता है.
  • जांच ​​का चरण: SIT अभी भी बयान दर्ज कर रही है. अधिकारियों ने बताया है कि हालांकि धर्मांतरण के आरोप मौजूद हैं, लेकिन नई कानून के तहत परिभाषित जबरन धर्मांतरण के विशिष्ट मामलों की पुष्टि करना जरूरी है, तभी उन विशिष्ट धाराओं को जोड़ा जा सकता है.

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Written By: Shristi S
Last Updated: 2026-04-18 15:50:18

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TCS Nashik Case Explained: महाराष्ट्र के नासिक टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज़ (TCS) के BPO में एक कथित धर्म-परिवर्तन और उत्पीड़न नेटवर्क का भंडाफोड़ हुआ है, जिसने पूरे देश को हिला कर रख दिया है. कई FIR में 2022 से चल रहे इस सुनियोजित दुर्व्यवहार का विस्तार से ज़िक्र किया गया है.
 
ऐसे में क्या इस मामले में आरोपी पर महाराष्ट्र के धर्मांतरण विरोधी कानून के तहत आरोप लगाए जा सकते हैं? पुलिस ने इसके बजाय धारा 299 क्यों लगाई? और क्या राज्य का नया धार्मिक कानून इस मामले पर लागू होता है? चलिए विस्तार से जानें.
 

TCS नासिक मामले में आरोप, FIR और 17 अप्रैल को क्या हुआ?

पुलिस ने भारतीय न्याय संहिता (BNS) के तहत नौ FIR (8 महिलाओं द्वारा और 1 पुरुष कर्मचारी द्वारा) दर्ज की हैं जिसमें-
 
  • यौन अपराध: बलात्कार (धारा 69), यौन उत्पीड़न (धारा 75), पीछा करना (धारा 78), और लज्जा भंग करना (धारा 79).
  • धार्मिक जबरदस्ती: जबरदस्ती धर्म-परिवर्तन का प्रयास और धार्मिक भावनाओं को आहत करने के जानबूझकर किए गए कृत्य (धारा 299).
पुलिस के अनुसार, पीड़ितों ने बताया कि उन्हें नमाज़ पढ़ने, रमज़ान के रोज़े रखने और अपनी धार्मिक मान्यताओं के विरुद्ध भोजन करने के लिए मजबूर किया गया.
 

मुख्य आरोपी कौन हैं?

इस मामले के मुख्य आरोपी जिसमें दानिश शेख, तौसीफ़ अत्तार, रज़ा रफ़ीक़ मेमन, शाहरुख कुरैशी, शफ़ी शेख और आसिफ़ आफ़ताब अंसारी टीम लीडर है, वहीं इन सबको मैनेज करने वालें में अश्विनी चैननी जो, असिस्टेंट जनरल मैनेजर और POSH समिति की सदस्य; उन पर वर्षों तक कर्मचारियों की शिकायतों को नज़रअंदाज़ करने और दबाने का आरोप है, जिसके चलते उन्हें गिरफ़्तार कर लिया गया है. वहीं निदा खान को पुलिस ने इस मामले में एक अहम कड़ी बताया है; TCS ने उन्हें निलंबित कर दिया है और फ़िलहाल वह अग्रिम ज़मानत की मांग कर रही हैं.
 

जांच

फ़िलहाल कम से कम 7 लोग पुलिस हिरासत में हैं. एक महिला DCP (पुलिस उपायुक्त) के नेतृत्व में 12 सदस्यों वाली एक विशेष जांच टीम (SIT) इस मामले की जांच कर रही है. 40 दिनों तक चले एक गुप्त अभियान के दौरान इन आरोपों की पुष्टि हुई; इस अभियान में महिला पुलिस अधिकारियों ने नए कर्मचारियों का रूप धरकर कार्यालय के भीतर रहकर जांच की थी.
 

17 अप्रैल को क्या हुआ?

निदा खान के लिए आधिकारिक सस्पेंशन लेटर सामने आए, जिनमें कंपनी के सभी सिस्टम तक उनकी पहुंच खत्म कर दी गई थी. निदा खान ने अग्रिम ज़मानत के लिए नासिक कोर्ट का रुख किया, और राहत के लिए अपनी प्रेग्नेंसी और मेडिकल हालत का हवाला दिया. आरोपी शफी शेख और रज़ा मेमन को आगे की पूछताछ के लिए 18 अप्रैल तक पुलिस हिरासत में भेज दिया गया; उनके मोबाइल फ़ोन डिजिटल फ़ॉरेंसिक के लिए ज़ब्त कर लिए गए हैं.
 
TCS ने नासिक यूनिट के सभी कर्मचारियों को निर्देश दिया है कि वे जांच की गहमागहमी के दौरान अपनी सुरक्षा और सुविधा सुनिश्चित करने के लिए अनिश्चित काल तक घर से काम करें. राष्ट्रीय महिला आयोग (NCW) ने एक फैक्ट-फाइंडिंग कमेटी की घोषणा की, जिसकी अगुवाई जस्टिस (रिटायर्ड) साधना जाधव करेंगी; यह कमेटी यूनिट का दौरा करेगी और 10 दिनों के भीतर अपनी रिपोर्ट सौंपेगी. सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की गई, जिसमें धोखे से किए गए जबरदस्ती के धर्मांतरण को राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक गंभीर खतरा मानने के निर्देश देने की मांग की गई; इसमें TCS नासिक मामले को एक मुख्य उदाहरण के तौर पर पेश किया गया.
 

क्या महाराष्ट्र में धर्मांतरण विरोधी कानून है?

महाराष्ट्र धर्म स्वतंत्रता अधिनियम, 2026 (जिसे ‘धर्म स्वातंत्र्य अधिनियम’ भी कहा जाता है) को महाराष्ट्र विधानसभा ने 16 मार्च, 2026 को पारित किया था. इस कानून का मकसद ज़बरदस्ती, धोखाधड़ी, प्रलोभन या सिर्फ़ शादी के मकसद से किए जाने वाले धार्मिक धर्मांतरणों पर रोक लगाना है.
 

क्या है प्रावधान और दंड?

इस अधिनियम के तहत आने वाले अपराध संज्ञेय (cognizable) और गैर-ज़मानती होते हैं. यह अधिनियम अवैध धर्मांतरणों के लिए कड़ी सज़ा का प्रावधान करता है, और कुछ खास मामलों में सज़ा की गंभीरता और बढ़ जाती है:
 
  • सामान्य मामले: 7 साल तक की जेल और ₹1 लाख का जुर्माना.
  • कमज़ोर वर्ग: नाबालिगों, महिलाओं या SC/ST समुदाय के लोगों से जुड़े मामलों में जुर्माना बढ़कर ₹5 लाख हो जाता है.
  • सामूहिक धर्मांतरण: 7 से 10 साल तक की जेल और ₹5 लाख के जुर्माने की सज़ा.
  • बार-बार किए जाने वाले/संस्थागत अपराध: 10 साल तक की जेल, साथ ही ज़्यादा जुर्माना और संबंधित संस्था का रजिस्ट्रेशन रद्द करने का प्रावधान.
 

कानूनी ढांचा

यह अधिनियम राज्य में धार्मिक धर्मांतरणों के लिए एक कड़ा कानूनी ढांचा पेश करता है:
 
  • अनिवार्य सूचना: धर्मांतरण करने के इच्छुक व्यक्तियों को ज़िला मजिस्ट्रेट को 60 दिन पहले इसकी सूचना देना अनिवार्य है.
  •  रूपांतरण के बाद की घोषणा: धर्मांतरण करने वाले व्यक्तियों और आयोजकों को धर्मांतरण समारोह के 21 दिनों के भीतर एक घोषणा पत्र जमा करना होगा.
  • विवाह का रद्द होना: कोई भी विवाह जो केवल गैर-कानूनी धर्मांतरण के उद्देश्य से किया गया हो, उसे अदालत द्वारा शून्य और अमान्य घोषित किया जा सकता है.
  • बच्चों के अधिकार: ऐसे संबंध से पैदा हुए बच्चे को मां के मूल धर्म का अनुयायी माना जाता है, लेकिन उसे माता-पिता दोनों की संपत्ति पर उत्तराधिकार के अधिकार प्राप्त रहते हैं.
  • सबूत का बोझ: यह साबित करने की ज़िम्मेदारी कि धर्मांतरण स्वेच्छा से किया गया था, आरोपी या उस व्यक्ति पर होती है जिसने धर्मांतरण करवाया था.
 

क्या महाराष्ट्र में धर्मांतरण विरोधी कानून लागू है?

यह विधेयक विधानसभा द्वारा पारित कर दिया गया है और कानून बनने के लिए राज्यपाल की मंज़ूरी का इंतज़ार कर रहा है. सत्ताधारी ‘महायुति’ सरकार ने इस कानून को लव जिहाद को रोकने और सामाजिक सद्भाव की रक्षा करने के लिए एक आवश्यक साधन के रूप में प्रस्तुत किया है. आलोचकों और नागरिक अधिकार समूहों का तर्क है कि यह कानून प्रतिगामी है, निजता के अधिकार का उल्लंघन करता है, और अनुच्छेद 25 (धर्म की स्वतंत्रता) का हनन करता है.
 

आरोपियों पर धारा 299 के तहत मामला क्यों दर्ज किया गया है?

BNS की धारा 299 जानबूझकर और दुर्भावनापूर्ण ढंग से किए गए ऐसे कृत्यों से संबंधित है, जिनका उद्देश्य किसी वर्ग के धर्म या धार्मिक विश्वासों का अपमान करके उनकी धार्मिक भावनाओं को आहत करना हो. इसके तहत 3 साल तक की कैद, या जुर्माना, या दोनों का प्रावधान है. इन मामलों की सुनवाई कोई भी मजिस्ट्रेट कर सकता है.
 
TCS नासिक मामले में आरोपियों पर मुख्य रूप से ‘भारतीय न्याय संहिता’ (BNS) की धारा 299 के तहत मामला दर्ज किया गया है, क्योंकि यह धारा विशेष रूप से उन जानबूझकर और दुर्भावनापूर्ण कृत्यों से निपटती है जिनका उद्देश्य धार्मिक भावनाओं को आहत करना होता है. हालांकि आरोपों में जबरदस्ती धर्मांतरण शामिल है, फिर भी विशिष्ट कानूनी आरोप मौजूदा सबूतों और दस्तावेज़ों में दर्ज कृत्यों की विशिष्ट प्रकृति (जैसे देवी-देवताओं के बारे में अपमानजनक टिप्पणियां) के आधार पर चुने जाते हैं.
 

धारा 299 बनाम धर्मांतरण विरोधी कानून

पुलिस ने धार्मिक भावनाओं को आहत करने के तत्काल सबूतों से निपटने के लिए BNS की धारा 299 (जिसने IPC की धारा 295A का स्थान लिया है) का प्रयोग किया है.
 
  • धारा 299 (BNS): शब्दों, संकेतों या दृश्य प्रस्तुतियों के माध्यम से धार्मिक भावनाओं का अपमान करने या उन्हें आहत करने से संबंधित है.
  • धर्मांतरण विरोधी कानून: ‘महाराष्ट्र धर्म स्वतंत्रता अधिनियम 2026’ विशेष रूप से प्रलोभन, ज़ोर-ज़बरदस्ती या विवाह के माध्यम से किए जाने वाले धर्मांतरण को लक्षित करता है.
  • सबूतों का मिलान: दर्ज की गई नौ FIRs में से कई में, पीड़ितों ने हिंदू देवी-देवताओं और शिवलिंग के बारे में आपत्तिजनक टिप्पणियों की शिकायत की है, जो सीधे तौर पर ‘धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने’ (धारा 299) के दायरे में आता है.
  • जांच ​​का चरण: SIT अभी भी बयान दर्ज कर रही है. अधिकारियों ने बताया है कि हालांकि धर्मांतरण के आरोप मौजूद हैं, लेकिन नई कानून के तहत परिभाषित जबरन धर्मांतरण के विशिष्ट मामलों की पुष्टि करना जरूरी है, तभी उन विशिष्ट धाराओं को जोड़ा जा सकता है.

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