Delhi Metro Seat Occupancy: दिल्ली मेट्रो को दिल्ली-एनसीआर की लाइफलइन भी कहा जाता है. बेहद कम खर्च और कम समय में आप दिल्ली के लगभग सभी इलाकों तक पहुंच सकते हैं. कामकाजी लोगों के लिए दिल्ली मेट्रो वरदान से कम नहीं है. इसके जरिए आप ठीक अनुमानित समय पर ऑफिस पहुंच सकते हैं, लेकिन सीट मिलेगी या नहीं, ये बता पाना थोड़ा मुश्किल है. दरअसल, कुछ विशेष समय में मेट्रो से सफर करने वाले यात्रियों की संख्या भी बढ़ जाती है.
पीक आवर्स में दिल्ली मेट्रो में सीट पकड़ना को दूर मेट्रो में अंदर पहुंचना भी मुश्किल हो जाता है. ऐसी स्थिति में दिल्ली मेट्रो की एक सुविधा आपके लिए मददगार साबित हो सकती है, जानें इसके बारे में-
कैसे जानें सीट मिलेगी या नहीं?
आपको मेट्रो में सीट मिलेगी या नहीं. ये तो ऑक्यूपेंसी पर डिपेंड करता है. मेट्रो के किस कोच में कम भीड़ है, ये जानने के लिए दिलली मेट्रो की तरफ से हर स्टेशन पर इलेक्ट्रॉनिक स्क्रीन लगाई गई है. इन स्क्रीन्स को पैसेंजर इंफॉर्मेशन डिस्प्ले सिस्टम-PIDS कहते हैं.
- PIDS स्क्रीन पर मेट्रो के आने का समय और ट्रेन के कोच में लगभग कितनी ओक्यूपेंसी है, की जानकारी दी जाती है.
- उदाहरण के लिए मेट्रो के C1, C2, C3, C4 कोच में 30%, 60%, 40% या 90% ओक्यूपेंसी यानी कोच कितना भरा हुआ है.
- ये जानकारी मेट्रो के हर कोच में लगे वेट सेंसर के आधार पर सॉफ्टवेयर सिस्टम पर अपडेट की जाती है.
- वेट सेंसर के जरिए रियल टाइम में अलग-अलग कोच में यात्रियों की संख्या से वजन का अनुमान लगाया जाता है.
- इस तरीके से पैसेंजर इंफॉर्मेशन डिस्प्ले सिस्टम-PIDS को अपडेट होता है, जो आपको कंफर्टेबल ट्रेवल में मदद करता है.

ये तरीके भी आजमाएं
-दिल्ली मेट्रो के प्लेटफॉर्म, जहां लिफ्ट और सीढ़िया थोड़ा दूर हो, वहां के मेट्रो कोच को टार्गेट करें. जैसे सबसे पहला और आखिरी डब्बा. ये ज्यादातर कम भरे हुए होते हैं.
-मेट्रो यात्रियों की बॉडी लेग्वेज भी आपको सीट दिला सकती है. अपने स्टेशन पर उतरने से पहले यात्री फोन बंद करके कपड़े और बैग ठीक करने लगते हैं. ऐसे में वहां खड़े होने पर आपको सीट मिले के चांज बनेंगे.
-ऑफिस और मेट्रो पकड़ने की टाइमिग को स्मार्टली मैनेज करें. भीड को अवॉइड करने के लिए आप अपने तय वक्त से 10 से 15 मिनट पहले या बाद में मेट्रो ले सकते हैं.
-सीट के भरने का पैटर्न समझें. उन स्टेशन पर अलर्ट रहें, जहां से ज्यादा लोग आते-जाते हैं.