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Gurugram Waterlogging: करोड़ों के फ्लैट्स, टैक्स का बोझ… और सुविधाएं नाले जैसी! बारिश में तड़पता गुरुग्राम का कमर्शियल हब

गुरुग्राम में जरा सी बारिश हो जाए तो भी जनजीवन अस्त-व्यस्त हो जाता है. साइबर सिटी और कमर्शियल हब में जलभराव, धंसती सड़कें और ट्रैफिक जाम लाखों लोगों के लिए मुसीबत बन जाती हैं. शासन-प्रशासन के वादे और दावे हर साल फेल नजर आते हैं.

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Last Updated: 2026-09-02 16:24:39

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एक मामूली गांव से एक आधुनिक शहर के रूप में विकसित हुआ गुरुग्राम आज भारत की ‘मिलेनियम सिटी सेंटर’ और कॉरपोरेट पावरहाउस के रूप में जाना जाता है. लेकिन हर मानसून में इसे ‘गुरुजाम’ और ‘जलग्राम’ जैसे नाम भी मिलते हैं. यहां देश के सबसे महंगे घर और ऑफिस मौजूद हैं, लेकिन कुछ ही घंटों की बारिश में सड़कें नदी और नालों में बदल जाती हैं. यह बारिश के मौसम हर रोज की स्थिति है. 

हर साल की तरह इस साल भी जब-जब बारिश होती है तो शहर के सबसे पॉश और कमर्शियल हब में रहने व काम करने वालों का जनजीवन पूरी तरह से अस्त-व्यस्त हो जाता है. सवाल यह खड़ा हो रहा है कि अरबों रुपये का राजस्व देने वाला यह शहर अपने नागरिकों को सुरक्षित सड़कें और बुनियादी ढांचा देने में इतना बेबस क्यों दिखता है?

सड़कों पर समंदर, बंपर-टू-बंपर जाम और धंसता इंफ्रास्ट्रक्चर

मानसून की भारी बारिश के बाद शहर की रफ्तार थम जाती है. कमर्शियल और प्रीमियम रिहायशी इलाकों जैसे गोल्फ कोर्स रोड, डीएलएफ फेज 5, सुशांत लोक, साइबर सिटी, सुभाष चौक, इफ्को चौक और सोहना रोड पर सड़कें नदियों जैसी नजर आने लगती हैं. कई प्रमुख चौराहों और आंतरिक सड़कों पर पानी घुटनों से कमर तक भर जाता है, जिसमें गाड़ियों डूब जाती हैं तो कई खराब हो जीता हैं. 

दिल्ली-जयपुर एक्सप्रेसवे (NH-48) समेत शहर के सभी प्रमुख मार्गों पर किलोमीटरों लंबा बंपर-टू-बंपर ट्रैफिक जाम लग जाता है. पिछले हफ्ते बारिश के भारी दबाव और सीवर लाइन के क्षरण के कारण इफ्को चौक के पास सर्विस रोड पर लगभग 10 फीट लंबा सड़क का हिस्सा अचानक धंस गया. इस हादसे ने शहर के जर्जर और असुरक्षित इंफ्रास्ट्रक्चर की पोल खोलकर रख दी. जलभराव से बिजली के सब-स्टेशन और ट्रांसफार्मर डूब गए, जिससे कई हाई-राइज सोसायटियों और पॉश कॉलोनियों में लंबे समय तक बिजली और जलापूर्ति ठप रही.

आपात स्थिति में शहर

जुलाई महीने में बारिश के बाद जलभराव के कारण सड़कों पर मचे हड़कंप को देखते हुए जिला आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (DDMA) को आपात कदम उठाने पड़े. प्रशासन ने साइबर सिटी और अन्य टेक पार्कों के कॉरपोरेट ऑफिसों व निजी संस्थानों को कर्मचारियों के लिए ‘वर्क फ्रॉम होम’ लागू करने की एडवाइजरी जारी की. बच्चों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए स्कूलों को ऑनलाइन मोड में शिफ्ट करने और जलभराव वाले इलाकों में स्कूल बसों के संचालन पर रोक लगाने के निर्देश दिए गए.

आम लोगों पर दोहरी मार 

कमर्शियल हब के अलावा रिहायशी इलाकों की स्थिति बेहद दुखद है. शहर के सिविल अस्पताल को जोड़ने वाले रोड पर पानी भर जाने से एम्बुलेंस चालकों को गंभीर मरीजों को लाने-ले जाने में भारी मशक्कत करनी पड़ती है. स्कूली वैन जलभराव वाले इलाकों में जाने से मना कर देती हैं, जिससे माता-पिता को घुटने भर पानी में चलकर बच्चों को सुरक्षित लाना पड़ता है.

सड़कों पर छिप चुके गहरे गड्ढे और बिना ढक्कन के खुले पड़े सीवर व रेनवाटर हार्वेस्टिंग के मैनहोल पैदल चलने वालों के लिए जानलेवा साबित हो रहे हैं. इसके साथ ही, सड़कों पर घूमते 7,000 से अधिक आवारा मवेशी पानी से भरी संकरी सड़कों पर हादसों और जाम के खतरे को और बढ़ा देते हैं.

जनप्रतिनिधि और प्रशासन फेल 

गुरुग्राम की इस दुर्दशा के पीछे 5-5 प्रशासनिक एजेंसियों (GMDA, MCG, HSVP, NHAI और सिंचाई विभाग) का वह कागजी समन्वय है, जो हर मानसून में ताश के पत्तों की तरह ढह जाता है. मुख्यमंत्री स्तर की समीक्षा बैठकों का दौर सिर्फ फाइलों में सिमट कर रह जाता है. लेकिन असली तमाशा तो जनता द्वारा चुने गए उन जनप्रतिनिधियों का है, जिन्हें जनता ने समस्याओं का समाधान ढूंढने के लिए चुना था.

गुरुग्राम के भाजपा सांसद व केंद्रीय राज्य मंत्री राव इंद्रजीत सिंह और स्थानीय नेताओं के रवैये का हालिया उदाहरण इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है. सालों से सत्ता के मखमली गद्दों पर बैठकर आज भी उन्हें दुर्दशा का कारण ‘कांग्रेस शासनकाल का विकास’ ही नजर आता है. खुले मंच से यह कबूल कर लेना कि “हम जो कर रहे हैं वह महज कामचलाऊ समाधान है और इसका हल केवल अंडरग्राउंड टनल है,’ यह दर्शाता है कि हमारे जनप्रतिनिधि बिना किसी शर्म के जनता की तबाही को ‘कामचलाऊ राजनीति’ के भरोसे छोड़ चुके हैं. जब ‘मिलनियम सिटी’ डूब रही होती है, तब एसी कमरों में बैठकर पिछली सरकारों पर दोष मढ़ना और ‘बैंड-एड’ जैसे बयानों की जुमलेबाजी करना यह साबित करता है कि जनता को ‘गुरुजाम’ और ‘जलग्राम’ के हवाले छोड़कर हमारे नेता अपनी जिम्मेदारी से पूरी तरह पल्ला झाड़ चुके हैं.

क्या संभल पाएगा गुरुग्राम?

अस्थायी समाधान के रूप में नगर निगम पंपों और सक्शन टैंकरों के जरिए पानी निकालने में जुटा है, लेकिन स्थायी समाधान के बिना यह शहर हर मानसून में डूबता रहेगा. देश को वैश्विक पटल पर पहचान दिलाने वाली ‘मिलेनियम सिटी’ को अगर अपना वजूद बचाना है, तो कागजी दावों और तात्कालिक राहत से आगे बढ़कर अपने ड्रेनेज और रोड इंफ्रास्ट्रक्चर को नए सिरे से पुनर्जीवित करना ही होगा.

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Last Updated: 2026-09-02 16:24:39

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एक मामूली गांव से एक आधुनिक शहर के रूप में विकसित हुआ गुरुग्राम आज भारत की ‘मिलेनियम सिटी सेंटर’ और कॉरपोरेट पावरहाउस के रूप में जाना जाता है. लेकिन हर मानसून में इसे ‘गुरुजाम’ और ‘जलग्राम’ जैसे नाम भी मिलते हैं. यहां देश के सबसे महंगे घर और ऑफिस मौजूद हैं, लेकिन कुछ ही घंटों की बारिश में सड़कें नदी और नालों में बदल जाती हैं. यह बारिश के मौसम हर रोज की स्थिति है. 

हर साल की तरह इस साल भी जब-जब बारिश होती है तो शहर के सबसे पॉश और कमर्शियल हब में रहने व काम करने वालों का जनजीवन पूरी तरह से अस्त-व्यस्त हो जाता है. सवाल यह खड़ा हो रहा है कि अरबों रुपये का राजस्व देने वाला यह शहर अपने नागरिकों को सुरक्षित सड़कें और बुनियादी ढांचा देने में इतना बेबस क्यों दिखता है?

सड़कों पर समंदर, बंपर-टू-बंपर जाम और धंसता इंफ्रास्ट्रक्चर

मानसून की भारी बारिश के बाद शहर की रफ्तार थम जाती है. कमर्शियल और प्रीमियम रिहायशी इलाकों जैसे गोल्फ कोर्स रोड, डीएलएफ फेज 5, सुशांत लोक, साइबर सिटी, सुभाष चौक, इफ्को चौक और सोहना रोड पर सड़कें नदियों जैसी नजर आने लगती हैं. कई प्रमुख चौराहों और आंतरिक सड़कों पर पानी घुटनों से कमर तक भर जाता है, जिसमें गाड़ियों डूब जाती हैं तो कई खराब हो जीता हैं. 

दिल्ली-जयपुर एक्सप्रेसवे (NH-48) समेत शहर के सभी प्रमुख मार्गों पर किलोमीटरों लंबा बंपर-टू-बंपर ट्रैफिक जाम लग जाता है. पिछले हफ्ते बारिश के भारी दबाव और सीवर लाइन के क्षरण के कारण इफ्को चौक के पास सर्विस रोड पर लगभग 10 फीट लंबा सड़क का हिस्सा अचानक धंस गया. इस हादसे ने शहर के जर्जर और असुरक्षित इंफ्रास्ट्रक्चर की पोल खोलकर रख दी. जलभराव से बिजली के सब-स्टेशन और ट्रांसफार्मर डूब गए, जिससे कई हाई-राइज सोसायटियों और पॉश कॉलोनियों में लंबे समय तक बिजली और जलापूर्ति ठप रही.

आपात स्थिति में शहर

जुलाई महीने में बारिश के बाद जलभराव के कारण सड़कों पर मचे हड़कंप को देखते हुए जिला आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (DDMA) को आपात कदम उठाने पड़े. प्रशासन ने साइबर सिटी और अन्य टेक पार्कों के कॉरपोरेट ऑफिसों व निजी संस्थानों को कर्मचारियों के लिए ‘वर्क फ्रॉम होम’ लागू करने की एडवाइजरी जारी की. बच्चों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए स्कूलों को ऑनलाइन मोड में शिफ्ट करने और जलभराव वाले इलाकों में स्कूल बसों के संचालन पर रोक लगाने के निर्देश दिए गए.

आम लोगों पर दोहरी मार 

कमर्शियल हब के अलावा रिहायशी इलाकों की स्थिति बेहद दुखद है. शहर के सिविल अस्पताल को जोड़ने वाले रोड पर पानी भर जाने से एम्बुलेंस चालकों को गंभीर मरीजों को लाने-ले जाने में भारी मशक्कत करनी पड़ती है. स्कूली वैन जलभराव वाले इलाकों में जाने से मना कर देती हैं, जिससे माता-पिता को घुटने भर पानी में चलकर बच्चों को सुरक्षित लाना पड़ता है.

सड़कों पर छिप चुके गहरे गड्ढे और बिना ढक्कन के खुले पड़े सीवर व रेनवाटर हार्वेस्टिंग के मैनहोल पैदल चलने वालों के लिए जानलेवा साबित हो रहे हैं. इसके साथ ही, सड़कों पर घूमते 7,000 से अधिक आवारा मवेशी पानी से भरी संकरी सड़कों पर हादसों और जाम के खतरे को और बढ़ा देते हैं.

जनप्रतिनिधि और प्रशासन फेल 

गुरुग्राम की इस दुर्दशा के पीछे 5-5 प्रशासनिक एजेंसियों (GMDA, MCG, HSVP, NHAI और सिंचाई विभाग) का वह कागजी समन्वय है, जो हर मानसून में ताश के पत्तों की तरह ढह जाता है. मुख्यमंत्री स्तर की समीक्षा बैठकों का दौर सिर्फ फाइलों में सिमट कर रह जाता है. लेकिन असली तमाशा तो जनता द्वारा चुने गए उन जनप्रतिनिधियों का है, जिन्हें जनता ने समस्याओं का समाधान ढूंढने के लिए चुना था.

गुरुग्राम के भाजपा सांसद व केंद्रीय राज्य मंत्री राव इंद्रजीत सिंह और स्थानीय नेताओं के रवैये का हालिया उदाहरण इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है. सालों से सत्ता के मखमली गद्दों पर बैठकर आज भी उन्हें दुर्दशा का कारण ‘कांग्रेस शासनकाल का विकास’ ही नजर आता है. खुले मंच से यह कबूल कर लेना कि “हम जो कर रहे हैं वह महज कामचलाऊ समाधान है और इसका हल केवल अंडरग्राउंड टनल है,’ यह दर्शाता है कि हमारे जनप्रतिनिधि बिना किसी शर्म के जनता की तबाही को ‘कामचलाऊ राजनीति’ के भरोसे छोड़ चुके हैं. जब ‘मिलनियम सिटी’ डूब रही होती है, तब एसी कमरों में बैठकर पिछली सरकारों पर दोष मढ़ना और ‘बैंड-एड’ जैसे बयानों की जुमलेबाजी करना यह साबित करता है कि जनता को ‘गुरुजाम’ और ‘जलग्राम’ के हवाले छोड़कर हमारे नेता अपनी जिम्मेदारी से पूरी तरह पल्ला झाड़ चुके हैं.

क्या संभल पाएगा गुरुग्राम?

अस्थायी समाधान के रूप में नगर निगम पंपों और सक्शन टैंकरों के जरिए पानी निकालने में जुटा है, लेकिन स्थायी समाधान के बिना यह शहर हर मानसून में डूबता रहेगा. देश को वैश्विक पटल पर पहचान दिलाने वाली ‘मिलेनियम सिटी’ को अगर अपना वजूद बचाना है, तो कागजी दावों और तात्कालिक राहत से आगे बढ़कर अपने ड्रेनेज और रोड इंफ्रास्ट्रक्चर को नए सिरे से पुनर्जीवित करना ही होगा.

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