एक मामूली गांव से एक आधुनिक शहर के रूप में विकसित हुआ गुरुग्राम, आज भारत की ‘मिलेनियम सिटी सेंटर’ और कॉरपोरेट पावरहाउस के रूप में जाना जाता है. लेकिन हर मानसून में इसे ‘गुरुजाम’ और ‘जलग्राम’ जैसे नाम भी मिलते हैं. यहां देश के सबसे महंगे घर और ऑफिस मौजूद हैं, लेकिन कुछ ही घंटों की बारिश में सड़कें नदी और नालों में बदल जाती हैं
हर साल की तरह इस साल भी मूसलाधार बारिश के बाद, शहर के सबसे पॉश और कमर्शियल हब में रहने व काम करने वालों का जनजीवन पूरी तरह से अस्त-व्यस्त हो गया है. सवाल यह खड़ा हो रहा है कि अरबों रुपये का राजस्व पैदा करने वाला यह शहर, अपने नागरिकों को सुरक्षित सड़कें और बुनियादी ढांचा देने में इतना बेबस क्यों दिखता है?
सड़कों पर समंदर, बंपर-टू-बंपर जाम और धंसता इंफ्रास्ट्रक्चर
मानसून की भारी बारिश के बाद शहर की रफ्तार थम सी गई है. कमर्शियल और प्रीमियम रिहायशी इलाकों जैसे गोल्फ कोर्स रोड, डीएलएफ फेज 5, सुशांत लोक, साइबर सिटी, सुभाष चौक, इफ्को चौक और सोहना रोड पर सड़कें नदियों जैसी नजर आने लगीं. कई प्रमुख चौराहों और आंतरिक सड़कों पर पानी घुटनों से कमर तक भर गया, जिसमें दर्जनों गाड़ियां डूब गईं.
दिल्ली-जयपुर एक्सप्रेसवे (NH-48) समेत शहर के सभी प्रमुख मार्गों पर किलोमीटरों लंबा बंपर-टू-बंपर ट्रैफिक जाम लग गया. बारिश के भारी दबाव और सीवर लाइन के क्षरण के कारण इफ्को चौक के पास सर्विस रोड पर लगभग 10 फीट लंबा सड़क का हिस्सा अचानक धंस गया. इस हादसे ने शहर के जर्जर और असुरक्षित इंफ्रास्ट्रक्चर की पोल खोलकर रख दी. जलभराव से बिजली के सब-स्टेशन और ट्रांसफार्मर डूब गए, जिससे कई हाई-राइज सोसायटियों और पॉश कॉलोनियों में लंबे समय तक बिजली और जलापूर्ति ठप रही.
आपात स्थिति में शहर
जलभराव के कारण सड़कों पर मचे हड़कंप को देखते हुए जिला आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (DDMA) को आपात कदम उठाने पड़े. प्रशासन ने साइबर सिटी और अन्य टेक पार्कों के कॉरपोरेट ऑफिसों व निजी संस्थानों को कर्मचारियों के लिए ‘वर्क फ्रॉम होम’ लागू करने की एडवाइजरी जारी की. बच्चों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए स्कूलों को ऑनलाइन मोड में शिफ्ट करने और जलभराव वाले इलाकों में स्कूल बसों के संचालन पर रोक लगाने के निर्देश दिए गए.
आम लोगों पर दोहरी मार
कमर्शियल हब के अलावा, रिहायशी इलाकों की स्थिति बेहद दुखद है. शहर के सिविल अस्पताल को जोड़ने वाले रोड पर पानी भर जाने से एम्बुलेंस चालकों को गंभीर मरीजों को लाने-ले जाने में भारी मशक्कत करनी पड़ती है. स्कूली वैन जलभराव वाले इलाकों में जाने से मना कर देती हैं, जिससे माता-पिता को घुटने भर पानी में चलकर बच्चों को सुरक्षित लाना पड़ता है.
सड़कों पर छिप चुके गहरे गड्ढे और बिना ढक्कन के खुले पड़े सीवर व रेनवाटर हार्वेस्टिंग के मैनहोल पैदल चलने वालों के लिए जानलेवा साबित हो रहे हैं. इसके साथ ही, सड़कों पर घूमते 7,000 से अधिक आवारा मवेशी पानी से भरी संकरी सड़कों पर हादसों और जाम के खतरे को और बढ़ा देते हैं.
क्या संभल पाएगा गुरुग्राम?
अस्थायी समाधान के रूप में नगर निगम पंपों और सक्शन टैंकरों के जरिए पानी निकालने में जुटा है, लेकिन स्थायी समाधान के बिना यह शहर हर मानसून में डूबता रहेगा. देश को वैश्विक पटल पर पहचान दिलाने वाली ‘मिलेनियम सिटी’ को अगर अपना वजूद बचाना है, तो कागजी दावों और तात्कालिक राहत से आगे बढ़कर अपने ड्रेनेज और रोड इंफ्रास्ट्रक्चर को नए सिरे से पुनर्जीवित करना ही होगा.