Apara Ekadashi Uay 2026: हिंदू धर्म में एकादशी तिथि को बेहद पवित्र माना गया है, लेकिन ज्येष्ठ माह की कृष्ण पक्ष में आने वाली अपरा एकादशी का महत्व और भी अधिक बताया गया है. मान्यता है कि इस दिन भगवान विष्णु की पूजा करने से व्यक्ति को अपने पुराने दोषों और नकारात्मक प्रभावों से राहत मिल सकती है. साथ ही जीवन में सुख, शांति और समृद्धि आने के योग बनते हैं.
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, अपरा एकादशी का व्रत और पूजा इंसान के जीवन में नई सकारात्मक ऊर्जा लेकर आती है. जो लोग लंबे समय से आर्थिक तंगी, मानसिक तनाव या पारिवारिक परेशानियों से जूझ रहे हैं, उनके लिए यह दिन बेहद खास माना जाता है. इस दिन कुछ विशेष उपाय करने से रुके हुए कामों में गति आने की भी मान्यता है.
तुलसी पूजा और दीपक का उपाय
अपरा एकादशी की शाम तुलसी के पौधे के पास घी का दीपक जलाना बेहद शुभ माना जाता है. पूजा के दौरान भगवान विष्णु के मंत्रों का जाप करते हुए तुलसी की परिक्रमा करने से घर का वातावरण सकारात्मक होता है. ऐसा कहा जाता है कि इससे नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है और परिवार में सुख-शांति बनी रहती है.
विष्णु अभिषेक से आर्थिक लाभ के संकेत
अगर किसी व्यक्ति को धन संबंधी दिक्कतें लगातार परेशान कर रही हों, तो इस दिन भगवान विष्णु का केसर मिश्रित दूध से अभिषेक करना लाभकारी माना गया है. धार्मिक मान्यता है कि इससे आर्थिक रुकावटें कम होती हैं और जीवन में स्थिरता आती है. पूजा के दौरान श्रीहरि और माता लक्ष्मी की आराधना करने से धन लाभ के योग मजबूत माने जाते हैं.
करें इस स्तोत्र का पाठ
।।श्रीहरि स्तोत्र।।
जगज्जालपालं चलत्कण्ठमालं
शरच्चन्द्रभालं महादैत्यकालं
नभोनीलकायं दुरावारमायं
सुपद्मासहायम् भजेऽहं भजेऽहं ॥
सदाम्भोधिवासं गलत्पुष्पहासं
जगत्सन्निवासं शतादित्यभासं
गदाचक्रशस्त्रं लसत्पीतवस्त्रं
हसच्चारुवक्त्रं भजेऽहं भजेऽहं ॥
रमाकण्ठहारं श्रुतिव्रातसारं
जलान्तर्विहारं धराभारहारं
चिदानन्दरूपं मनोज्ञस्वरूपं
ध्रुतानेकरूपं भजेऽहं भजेऽहं ॥
जराजन्महीनं परानन्दपीनं
समाधानलीनं सदैवानवीनं
जगज्जन्महेतुं सुरानीककेतुं
त्रिलोकैकसेतुं भजेऽहं भजेऽहं ॥
कृताम्नायगानं खगाधीशयानं
विमुक्तेर्निदानं हरारातिमानं
स्वभक्तानुकूलं जगद्व्रुक्षमूलं
निरस्तार्तशूलं भजेऽहं भजेऽहं ॥
समस्तामरेशं द्विरेफाभकेशं
जगद्विम्बलेशं ह्रुदाकाशदेशं
सदा दिव्यदेहं विमुक्ताखिलेहं
सुवैकुण्ठगेहं भजेऽहं भजेऽहं ॥
सुरालिबलिष्ठं त्रिलोकीवरिष्ठं
गुरूणां गरिष्ठं स्वरूपैकनिष्ठं
सदा युद्धधीरं महावीरवीरं
महाम्भोधितीरं भजेऽहं भजेऽहं ॥
रमावामभागं तलानग्रनागं
कृताधीनयागं गतारागरागं
मुनीन्द्रैः सुगीतं सुरैः संपरीतं
गुणौधैरतीतं भजेऽहं भजेऽहं ॥
फलश्रुति
इदं यस्तु नित्यं समाधाय चित्तं
पठेदष्टकं कण्ठहारम् मुरारे:
स विष्णोर्विशोकं ध्रुवं याति लोकं
जराजन्मशोकं पुनर्विन्दते नो ॥
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