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पाकिस्तान में भी है मां का शक्तिपीठ, जहां बलोच बनते हैं मंदिर के रक्षक, सच जानकर चौंक जाएंगे आप

Chaitra Navratri 2026: इस समय चैत्र नवरात्रि का पावन महीना चल रहा है,देशभर में मता के शक्तिपीठों पर  खुब भीड़ हो रही है,आपको बता दें कि आदिशक्ति के कुल 51 शक्तिपीठ हैं,जिनमे से एक पाकिस्तान में भी है, आइए जानते हैं इसके बारे में.

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Last Updated: March 26, 2026 16:27:20 IST

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 Hinglaj Shaktipeeth: इस समय चैत्र नवरात्रि का पावन समय चल रहा है और देशभर में मां दुर्गा के मंदिरों में भक्तों की भीड़ उमड़ रही है. शक्तिपीठों में तो आस्था अपने चरम पर है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार आदिशक्ति के कुल 51 शक्तिपीठ बताए गए हैं, जिनमें से एक ऐसा भी है जो भारत से बाहर, पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत में स्थित है. यह स्थान न सिर्फ धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि हिंदू और मुस्लिम समुदाय के बीच आपसी सद्भाव का भी प्रतीक माना जाता है.

पाकिस्तान के बलूचिस्तान क्षेत्र में स्थित मां हिंगलाज भवानी का यह शक्तिपीठ बेहद प्राचीन और चमत्कारी माना जाता है. स्थानीय लोग इसे ‘नानी का मंदिर’ या ‘नानी की दरगाह’ के नाम से भी जानते हैं. यह नाम इस बात का संकेत है कि यहां आस्था किसी एक धर्म तक सीमित नहीं है, बल्कि हर समुदाय के लोग इसे श्रद्धा से देखते हैं.

नाम के पीछे छिपा अर्थ

हिंगलाज नाम अपने आप में विशेष महत्व रखता है. ‘हिंग’ का अर्थ उग्र या रौद्र रूप से जुड़ा है, जबकि ‘लाज’ का मतलब लज्जा या विनम्रता से है. मान्यता है कि एक पौराणिक प्रसंग में जब मां शक्ति ने भगवान शिव के वक्ष पर कदम रखा, तो उन्हें लज्जा का अनुभव हुआ. इसी रौद्र और लज्जा के भाव के मेल से ‘हिंगलाज’ नाम प्रचलित हुआ.

चारधाम के समान मानी जाती है यात्रा

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मां हिंगलाज भवानी के दर्शन करना अत्यंत पुण्यदायी माना जाता है. कहा जाता है कि जैसे चारधाम यात्रा का विशेष महत्व होता है, उसी तरह जीवन में एक बार इस शक्तिपीठ के दर्शन करना भी बेहद शुभ फलदायी होता है. यह यात्रा साधकों के लिए आध्यात्मिक शांति और ऊर्जा का स्रोत मानी जाती है.

दुर्गा चालीसा में भी मिलता है उल्लेख

मां हिंगलाज भवानी की महिमा का वर्णन धार्मिक ग्रंथों में भी मिलता है. श्री दुर्गा चालीसा में भी देवी के इस स्वरूप का उल्लेख किया गया है, जिसमें उनकी महिमा को असीम और अवर्णनीय बताया गया है. इससे इस शक्तिपीठ की धार्मिक प्रतिष्ठा और भी बढ़ जाती है.

पौराणिक कथा से जुड़ा महत्व

इस शक्तिपीठ की उत्पत्ति माता सती की कथा से जुड़ी हुई है. कथा के अनुसार, जब दक्ष प्रजापति ने भगवान शिव का अपमान किया, तो माता सती ने यज्ञ में आत्मदाह कर लिया. शोक में डूबे भगवान शिव उनके शरीर को लेकर तांडव करने लगे. तब भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर को खंडित कर दिया, जिससे उनके अंग पृथ्वी के अलग-अलग स्थानों पर गिरे.मान्यता है कि जहां-जहां सती के अंग गिरे, वहीं शक्तिपीठ स्थापित हुए. हिंगलाज में सती के सिर का एक भाग गिरा था, जिसके कारण यह स्थान अत्यंत पवित्र माना जाता है. यह शक्तिपीठ हिंगोल नदी के किनारे चंद्रकूट पर्वत क्षेत्र में स्थित है.

सिंदूर और सुहाग से जुड़ी मान्यता

संस्कृत में ‘हिंगुल’ शब्द का संबंध सिंदूर से माना जाता है. इसी कारण इस शक्तिपीठ का विशेष महत्व सुहागिन महिलाओं के लिए भी है. वे यहां अपने दांपत्य जीवन की सुख-समृद्धि और अखंड सौभाग्य की कामना लेकर आती हैं.

बलोच समुदाय की आस्था और सेवा

इस शक्तिपीठ की सबसे खास बात यह है कि इसकी देखभाल स्थानीय बलोच समुदाय द्वारा की जाती है. वे इसे एक पवित्र स्थल मानते हुए पूरी श्रद्धा से इसकी सेवा करते हैं. यह स्थान धार्मिक एकता और भाईचारे का जीवंत उदाहरण बन चुका है.इतिहासकारों के अनुसार यहां मौजूद मंदिर हजारों साल पुराना माना जाता है. मंदिर एक गुफा के भीतर स्थित है, जहां देवी पिंडी रूप में विराजमान हैं. सिंध और कराची जैसे क्षेत्रों से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां दर्शन के लिए पहुंचते हैं.

 Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारियों का हम यह दावा नहीं करते कि ये जानकारी पूर्णतया सत्य एवं सटीक है. पाठकों से अनुरोध है कि इस लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें. India News इसकी सत्यता का दावा नहीं करता है.

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Last Updated: March 26, 2026 16:27:20 IST

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 Hinglaj Shaktipeeth: इस समय चैत्र नवरात्रि का पावन समय चल रहा है और देशभर में मां दुर्गा के मंदिरों में भक्तों की भीड़ उमड़ रही है. शक्तिपीठों में तो आस्था अपने चरम पर है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार आदिशक्ति के कुल 51 शक्तिपीठ बताए गए हैं, जिनमें से एक ऐसा भी है जो भारत से बाहर, पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत में स्थित है. यह स्थान न सिर्फ धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि हिंदू और मुस्लिम समुदाय के बीच आपसी सद्भाव का भी प्रतीक माना जाता है.

पाकिस्तान के बलूचिस्तान क्षेत्र में स्थित मां हिंगलाज भवानी का यह शक्तिपीठ बेहद प्राचीन और चमत्कारी माना जाता है. स्थानीय लोग इसे ‘नानी का मंदिर’ या ‘नानी की दरगाह’ के नाम से भी जानते हैं. यह नाम इस बात का संकेत है कि यहां आस्था किसी एक धर्म तक सीमित नहीं है, बल्कि हर समुदाय के लोग इसे श्रद्धा से देखते हैं.

नाम के पीछे छिपा अर्थ

हिंगलाज नाम अपने आप में विशेष महत्व रखता है. ‘हिंग’ का अर्थ उग्र या रौद्र रूप से जुड़ा है, जबकि ‘लाज’ का मतलब लज्जा या विनम्रता से है. मान्यता है कि एक पौराणिक प्रसंग में जब मां शक्ति ने भगवान शिव के वक्ष पर कदम रखा, तो उन्हें लज्जा का अनुभव हुआ. इसी रौद्र और लज्जा के भाव के मेल से ‘हिंगलाज’ नाम प्रचलित हुआ.

चारधाम के समान मानी जाती है यात्रा

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मां हिंगलाज भवानी के दर्शन करना अत्यंत पुण्यदायी माना जाता है. कहा जाता है कि जैसे चारधाम यात्रा का विशेष महत्व होता है, उसी तरह जीवन में एक बार इस शक्तिपीठ के दर्शन करना भी बेहद शुभ फलदायी होता है. यह यात्रा साधकों के लिए आध्यात्मिक शांति और ऊर्जा का स्रोत मानी जाती है.

दुर्गा चालीसा में भी मिलता है उल्लेख

मां हिंगलाज भवानी की महिमा का वर्णन धार्मिक ग्रंथों में भी मिलता है. श्री दुर्गा चालीसा में भी देवी के इस स्वरूप का उल्लेख किया गया है, जिसमें उनकी महिमा को असीम और अवर्णनीय बताया गया है. इससे इस शक्तिपीठ की धार्मिक प्रतिष्ठा और भी बढ़ जाती है.

पौराणिक कथा से जुड़ा महत्व

इस शक्तिपीठ की उत्पत्ति माता सती की कथा से जुड़ी हुई है. कथा के अनुसार, जब दक्ष प्रजापति ने भगवान शिव का अपमान किया, तो माता सती ने यज्ञ में आत्मदाह कर लिया. शोक में डूबे भगवान शिव उनके शरीर को लेकर तांडव करने लगे. तब भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर को खंडित कर दिया, जिससे उनके अंग पृथ्वी के अलग-अलग स्थानों पर गिरे.मान्यता है कि जहां-जहां सती के अंग गिरे, वहीं शक्तिपीठ स्थापित हुए. हिंगलाज में सती के सिर का एक भाग गिरा था, जिसके कारण यह स्थान अत्यंत पवित्र माना जाता है. यह शक्तिपीठ हिंगोल नदी के किनारे चंद्रकूट पर्वत क्षेत्र में स्थित है.

सिंदूर और सुहाग से जुड़ी मान्यता

संस्कृत में ‘हिंगुल’ शब्द का संबंध सिंदूर से माना जाता है. इसी कारण इस शक्तिपीठ का विशेष महत्व सुहागिन महिलाओं के लिए भी है. वे यहां अपने दांपत्य जीवन की सुख-समृद्धि और अखंड सौभाग्य की कामना लेकर आती हैं.

बलोच समुदाय की आस्था और सेवा

इस शक्तिपीठ की सबसे खास बात यह है कि इसकी देखभाल स्थानीय बलोच समुदाय द्वारा की जाती है. वे इसे एक पवित्र स्थल मानते हुए पूरी श्रद्धा से इसकी सेवा करते हैं. यह स्थान धार्मिक एकता और भाईचारे का जीवंत उदाहरण बन चुका है.इतिहासकारों के अनुसार यहां मौजूद मंदिर हजारों साल पुराना माना जाता है. मंदिर एक गुफा के भीतर स्थित है, जहां देवी पिंडी रूप में विराजमान हैं. सिंध और कराची जैसे क्षेत्रों से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां दर्शन के लिए पहुंचते हैं.

 Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारियों का हम यह दावा नहीं करते कि ये जानकारी पूर्णतया सत्य एवं सटीक है. पाठकों से अनुरोध है कि इस लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें. India News इसकी सत्यता का दावा नहीं करता है.

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