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High Paying Job Bitterness: हाई सैलरी नहीं, अब सुकून है असली लक्ष्य, छोड़ी 17 लाख की नौकरी, छिड़ी वर्क कल्चर पर बहस

High Paying Job Bitterness: भारत में बड़ी सैलरी को सफलता माना जाता है, लेकिन एक 24 वर्षीय युवक ने 17 LPA की नौकरी छोड़कर दिखाया कि हर अच्छी सैलरी, अच्छी जिंदगी की गारंटी नहीं होती.

Written By: Munna Kumar
Last Updated: 2026-04-16 09:20:28

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High Paying Job Bitterness: भारत में हाई सैलरी जॉब (High Paying Jobs) को अक्सर सफलता का सबसे बड़ा पैमाना माना जाता है, लेकिन क्या सिर्फ अच्छी सैलरी ही एक अच्छी नौकरी की पहचान होती है? यह सवाल आजकल फिर चर्चा में है, खासकर एक 24 साल के युवक की वजह से, जिसने 17 लाख प्रति वर्ष (17 LPA) की बैंकिंग नौकरी छोड़कर सबको सोचने पर मजबूर कर दिया. आमतौर पर लोग ऐसी नौकरी पाने का सपना देखते हैं, लेकिन इस युवक का अनुभव कुछ और ही कहानी बयां करता है.

उन्होंने बताया कि सैलरी भले ही आकर्षक थी, लेकिन वर्कप्लेस कल्चर, लंबे काम के घंटे और लगातार बढ़ते दबाव ने उसकी लाइफ क्वालिटी को प्रभावित किया. यही वजह है कि आज युवा सिर्फ पैसे नहीं, बल्कि बेहतर वर्क-लाइफ बैलेंस को भी महत्व देने लगे हैं. IIIT दिल्ली से ग्रेजुएट चिराग मदान ने इंस्टाग्राम पर अपना अनुभव साझा करते हुए बताया कि उन्होंने बैंकिंग सेक्टर में जॉब बड़े सपनों के साथ शुरू की थी. उन्हें लगा था कि उनका काम 9 से 5 के बीच रहेगा और लाइफ बैलेंस बनी रहेगी. लेकिन जॉब की असलियत कुछ और ही निकली.

बढ़ते काम के घंटे और सख्त माहौल

चिराग के अनुसार धीरे-धीरे उनका वर्क शेड्यूल 9 से 5 से बढ़कर 9 से 7 हो गया. इतना ही नहीं हफ्ते में 5 दिन की जगह 6 दिन काम करना पड़ता था. उन्होंने बताया कि कर्मचारियों के पास ठीक से खाना खाने का भी समय नहीं होता था. सिर्फ 15 मिनट में लंच खत्म कर दोबारा काम पर लौटने की उम्मीद की जाती थी. छुट्टी लेने के नियम भी इतने सख्त थे कि बीमार होने पर भी पूरी सफाई देनी पड़ती थी.

टारगेट का दबाव और मानसिक तनाव

बैंकिंग जॉब में सबसे बड़ी चुनौती थी भारी-भरकम सेल्स टारगेट. चिराग ने दावा किया कि हर महीने करोड़ों रुपये के बिजनेस लाने का दबाव रहता था. अगर टारगेट पूरा नहीं होता, तो सीनियर अधिकारियों का व्यवहार काफी सख्त हो जाता था. इस माहौल में कर्मचारियों को हर महीने नई शुरुआत करनी पड़ती थी, जिससे मानसिक दबाव और बढ़ जाता था.

गलत प्रोडक्ट बेचने का दबाव

चिराग ने सबसे गंभीर मुद्दा गलत तरीके से प्रोडक्ट बेचने का दबाव को लेकर उठाया. उन्होंने एक उदाहरण साझा किया, जिसमें एक क्लाइंट को ऐसे निवेश विकल्प दिए गए थे, जिनका रिटर्न फिक्स्ड डिपॉज़िट से भी कम था. उनके अनुसार, बैंक कर्मचारियों पर इतना दबाव होता है कि कई बार उन्हें ऐसे प्रोडक्ट बेचने पड़ते हैं, जिन पर उन्हें खुद भरोसा नहीं होता.

महंगे ऐप बनाम सस्ते विकल्प

उन्होंने यह भी बताया कि कर्मचारियों को महंगे ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म बेचने के लिए कहा जाता था, जबकि मार्केट में Zerodha और Groww जैसे सस्ते और बेहतर विकल्प मौजूद हैं. चिराग का कहना था कि जब वह खुद इन प्रोडक्ट्स पर भरोसा नहीं कर पा रहे थे, तो ग्राहकों को कैसे सलाह दें?

सोशल मीडिया पर लोगों की प्रतिक्रिया

उनकी पोस्ट वायरल होने के बाद कई लोगों ने अपने अनुभव भी साझा किए. कुछ यूज़र्स ने बताया कि उन्होंने भी इसी तरह के कारणों से बैंकिंग जॉब छोड़ी. कई लोगों ने माना कि इस सेक्टर में सेल्स का दबाव और गलत प्रोडक्ट बेचने की संस्कृति एक बड़ी समस्या बन चुकी है.

सैलरी से ज्यादा जरूरी है संतुलन

यह कहानी सिर्फ एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि उन हजारों युवाओं की है जो अच्छी सैलरी के बावजूद खराब वर्क कल्चर से जूझ रहे हैं. आखिरकार, एक अच्छी नौकरी वही है जो न सिर्फ पैसे दे, बल्कि सम्मान, संतुलन और सुकून भी दे.

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Last Updated: 2026-04-16 09:20:28

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High Paying Job Bitterness: भारत में हाई सैलरी जॉब (High Paying Jobs) को अक्सर सफलता का सबसे बड़ा पैमाना माना जाता है, लेकिन क्या सिर्फ अच्छी सैलरी ही एक अच्छी नौकरी की पहचान होती है? यह सवाल आजकल फिर चर्चा में है, खासकर एक 24 साल के युवक की वजह से, जिसने 17 लाख प्रति वर्ष (17 LPA) की बैंकिंग नौकरी छोड़कर सबको सोचने पर मजबूर कर दिया. आमतौर पर लोग ऐसी नौकरी पाने का सपना देखते हैं, लेकिन इस युवक का अनुभव कुछ और ही कहानी बयां करता है.

उन्होंने बताया कि सैलरी भले ही आकर्षक थी, लेकिन वर्कप्लेस कल्चर, लंबे काम के घंटे और लगातार बढ़ते दबाव ने उसकी लाइफ क्वालिटी को प्रभावित किया. यही वजह है कि आज युवा सिर्फ पैसे नहीं, बल्कि बेहतर वर्क-लाइफ बैलेंस को भी महत्व देने लगे हैं. IIIT दिल्ली से ग्रेजुएट चिराग मदान ने इंस्टाग्राम पर अपना अनुभव साझा करते हुए बताया कि उन्होंने बैंकिंग सेक्टर में जॉब बड़े सपनों के साथ शुरू की थी. उन्हें लगा था कि उनका काम 9 से 5 के बीच रहेगा और लाइफ बैलेंस बनी रहेगी. लेकिन जॉब की असलियत कुछ और ही निकली.

बढ़ते काम के घंटे और सख्त माहौल

चिराग के अनुसार धीरे-धीरे उनका वर्क शेड्यूल 9 से 5 से बढ़कर 9 से 7 हो गया. इतना ही नहीं हफ्ते में 5 दिन की जगह 6 दिन काम करना पड़ता था. उन्होंने बताया कि कर्मचारियों के पास ठीक से खाना खाने का भी समय नहीं होता था. सिर्फ 15 मिनट में लंच खत्म कर दोबारा काम पर लौटने की उम्मीद की जाती थी. छुट्टी लेने के नियम भी इतने सख्त थे कि बीमार होने पर भी पूरी सफाई देनी पड़ती थी.

टारगेट का दबाव और मानसिक तनाव

बैंकिंग जॉब में सबसे बड़ी चुनौती थी भारी-भरकम सेल्स टारगेट. चिराग ने दावा किया कि हर महीने करोड़ों रुपये के बिजनेस लाने का दबाव रहता था. अगर टारगेट पूरा नहीं होता, तो सीनियर अधिकारियों का व्यवहार काफी सख्त हो जाता था. इस माहौल में कर्मचारियों को हर महीने नई शुरुआत करनी पड़ती थी, जिससे मानसिक दबाव और बढ़ जाता था.

गलत प्रोडक्ट बेचने का दबाव

चिराग ने सबसे गंभीर मुद्दा गलत तरीके से प्रोडक्ट बेचने का दबाव को लेकर उठाया. उन्होंने एक उदाहरण साझा किया, जिसमें एक क्लाइंट को ऐसे निवेश विकल्प दिए गए थे, जिनका रिटर्न फिक्स्ड डिपॉज़िट से भी कम था. उनके अनुसार, बैंक कर्मचारियों पर इतना दबाव होता है कि कई बार उन्हें ऐसे प्रोडक्ट बेचने पड़ते हैं, जिन पर उन्हें खुद भरोसा नहीं होता.

महंगे ऐप बनाम सस्ते विकल्प

उन्होंने यह भी बताया कि कर्मचारियों को महंगे ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म बेचने के लिए कहा जाता था, जबकि मार्केट में Zerodha और Groww जैसे सस्ते और बेहतर विकल्प मौजूद हैं. चिराग का कहना था कि जब वह खुद इन प्रोडक्ट्स पर भरोसा नहीं कर पा रहे थे, तो ग्राहकों को कैसे सलाह दें?

सोशल मीडिया पर लोगों की प्रतिक्रिया

उनकी पोस्ट वायरल होने के बाद कई लोगों ने अपने अनुभव भी साझा किए. कुछ यूज़र्स ने बताया कि उन्होंने भी इसी तरह के कारणों से बैंकिंग जॉब छोड़ी. कई लोगों ने माना कि इस सेक्टर में सेल्स का दबाव और गलत प्रोडक्ट बेचने की संस्कृति एक बड़ी समस्या बन चुकी है.

सैलरी से ज्यादा जरूरी है संतुलन

यह कहानी सिर्फ एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि उन हजारों युवाओं की है जो अच्छी सैलरी के बावजूद खराब वर्क कल्चर से जूझ रहे हैं. आखिरकार, एक अच्छी नौकरी वही है जो न सिर्फ पैसे दे, बल्कि सम्मान, संतुलन और सुकून भी दे.

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