World Schizophrenia Awareness Day 2026: दुनियाभर में हर साल 24 मई को विश्व सिज़ोफ्रेनिया जागरूकता दिवस मनाया जाता है. इसको मनाने का मुख्य उद्देश्य इस गंभीर मानसिक बीमारी के बारे में जागरूकता फैलाना, इससे जुड़े सामाजिक कलंक (stigma) को दूर करना और समाज में पीड़ितों के लिए समर्थन बढ़ाना है. विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, दुनियाभर में लगभग 2.3 करोड़ लोग सिज़ोफ्रेनिया से प्रभावित हैं. हेल्थ एक्सपर्ट कहते हैं कि, ये सच है कि, सिज़ोफ्रेनिया एक गंभीर मानसिक बीमारी है. इस स्थिति में व्यक्ति की सोच, भावनाएं, व्यवहार और वास्तविकता को समझने की क्षमता प्रभावित हो सकती है. लेकिन, अगर समय पर उपचार मिल जाए तो व्यक्ति फिर ठीक से जीवन जी सकता है. यही वजह है कि, इस बीमारी के प्रति जागरूकता बहुत मायने रखती है. अब सवाल है कि आखिर सिजोफ्रेनिया क्या है? क्या इसका इलाज संभव है? बीमारी से कैसे करें बचाव? आइए जानते हैं इस बारे में-
सिज़ोफ्रेनिया क्या है?
डॉ. विवेक कुमार कहते हैं कि, सिजोफ्रेनिया एक गंभीर मानसिक विकार है जो व्यक्ति की सोचने, महसूस करने और वास्तविकता को समझने की क्षमता को प्रभावित करता है. ऐसी स्थिति में मतिभ्रम (hallucinations) और भ्रम (delusions) जैसी समस्याएं हो सकती हैं. इस बीमारी में व्यक्ति की समझदारी सबसे ज्यादा काम आती है.
डर और भेदभाव बीमारी को बढ़़ाने के लिए काफी
मनोचिकित्सा विभागाध्यक्ष डॉ. विपुल सिंह ने कहा- सिज़ोफ्रेनिया से पीड़ित मरीजों के लिए सबसे बड़ी समस्या केवल बीमारी नहीं, बल्कि समाज में फैला डर और भेदभाव है. यह कोई कमजोरी, गलत परवरिश या अंधविश्वास से जुड़ी बीमारी नहीं है, बल्कि मस्तिष्क से संबंधित एक चिकित्सीय समस्या है. समय पर इलाज और सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार से मरीजों की स्थिति में काफी सुधार संभव है.
उपचार के बाद मिल जाता सामान्य जीवन
मनोचिकित्सा विभाग के सहायक आचार्य डॉ. अंबरीष मिश्रा कहते हैं कि, समाज में अक्सर सिज़ोफ्रेनिया को लेकर गलत धारणाएं हैं. लोग इसे ‘दोहरी व्यक्तित्व’ या हिंसक व्यवहार से जोड़ देते हैं, जबकि अधिकांश मरीज हिंसक नहीं होते हैं. वे स्वयं उपेक्षा और भेदभाव का शिकार बनते हैं. हमें डर और मिथकों की जगह वैज्ञानिक सोच और संवेदनशीलता को बढ़ावा देना चाहिए. वे कहते हैं कि, मनोरोग ओपीडी में प्रतिदिन कई ऐसे मानसिक रोगी आते हैं, जिनके साथ कहीं न कहीं अनदेखी हुई होती है. कई ऐसे भी मरीज हैं जिनको उपचार के बाद सामान्य जीवन मिला है.
24 वर्षीय महिला का सफल इलाज
डॉ. विवेक कुमार कहते हैं कि, कुछ महीनों पहले 24 वर्षीय युवती को उसके परिजन मनोरोग विभाग लेकर आए थे. परिवार के अनुसार मरीज अकेले में अस्पष्ट आवाज़ में बड़बड़ाती रहती थी. उसे ऐसा महसूस होता था कि पुरुष और महिला आवाज़ें उसके बारे में बात कर रही हैं. मरीज को विभाग में भर्ती कर परीक्षण एवं इतिहास लिया गया. टीम ने उसका उपचार किया गया. लगभग एक सप्ताह के भीतर मरीज की स्थिति में स्पष्ट सुधार हुआ. डिस्चार्ज के बाद नियमित फॉलोअप और दवाओं के पालन से वर्तमान में वह सामान्य जीवन जी रही है.
जादू-टोना और अंधविश्वास भी बीमारी की वजह
डॉक्टर कहते हैं कि, एक 38 वर्षीय व्यक्ति भी सिजोफ्रेनिया का शिकार हो गया. काफी समय बाद परिजन अस्पताल लेकर पहुंचे. मरीज को लग रहा था कि, मोहल्ले के लोगों ने उस पर ‘जादू-टोना’ कर दिया है. मरीज बार-बार कह रहा था कि, लोग मेरे विरुद्ध षड्यंत्र कर रहे हैं. फिर डॉक्टर की टीम ने रोगी के लक्षणों को पहचानते हुए उचित इलाज किया. अब उसकी स्थिति में धीरे-धीरे सुधार हुआ.
किन लक्षणों से करें सिजोफ्रेनिया की पहचान
डॉ. विवेक कुमार कहते हैं कि, यदि किसी व्यक्ति में सामाजिक दूरी बनाना, पढ़ाई या काम में गिरावट, अत्यधिक शक करना, नींद की समस्या या असामान्य व्यवहार जैसे लक्षण दिखाई दें, तो इन्हें नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. ऐसा होने पर मनोचिकित्सक से परामर्श और उपचार लें.