द वन फिल्म के कलाकार: सिद्धार्थ मल्होत्रा, तमन्ना भाटिया, अनुप सोनी, सुनील ग्रोवर, श्वेता तिवारी, मनीष पॉल, सुलभा आर्य
द वन फिल्म निर्देशक: दीपक कुमार मिश्रा
द वन मूवी रेटिंग: 1/5 स्टार
अगर आप ‘पंचायत’ या ‘गुल्लक’ जैसी शानदार कहानियों की उम्मीद लेकर यह फिल्म देखने जा रहे हैं, तो आपको भारी निराशा होने वाली है. ‘द वन’ एक ऐसी फिल्म है जो शुरुआत में थोड़ी सी उत्सुकता तो जगाती है, लेकिन जैसे-जैसे आगे बढ़ती है, दर्शक का सिरदर्द बनने लगती है.
फिल्म की कहानी
तमन्ना भाटिया और सिद्धार्थ मल्होत्रा की ‘द वन’ (The One) की कहानी रहस्य, लोककथाओं के इर्द-गिर्द घूमती है. फिल्म की शुरुआत एक ऐसे रहस्यमयी जंगल से होती है, जहां सूरज ढलने के बाद जाना सख्त मना है. कहानी में बिहार की मिट्टी, मंदिर और छठ पर्व के माहौल का छोटा सा दृश्य दिखाया गया है, मूवी में बस यही सीन है जो खासकर बिहार, यूपी के लोगों को आकर्षित कर रही है.
फिल्म देवांचल के जंगल की कहानी बताती है, जिसके बीचों-बीच ‘वन देवी’ का एक मंदिर स्थित है. मान्यता है कि सूर्यास्त के बाद इस जंगल में कोई प्रवेश नहीं कर सकता. लेकिन, कुछ परिस्थितियों के कारण देवांचल के राजा को रात में जंगल में जाने के लिए मजबूर होना पड़ता है, और वहां एक ऐसी घटना घटती है जो इस रहस्यमयी कहानी की नींव रख देती है. इसके बाद कहानी सीधे सातवीं शताब्दी से छलांग लगाकर साल 2026 में पहुंच जाती है,
फिल्म की कमजोर कड़ी
कहानी की शुरुआत में मुंबई का एक इंजीनियर (सिद्धार्थ मल्होत्रा) और उसकी पत्नी (तमन्ना भाटिया) नज़र आते हैं. उनके कोई बच्चा नहीं है, लेकिन दोनों के बीच प्यार की कोई कमी नहीं है. शुरुआत में ही वे समुद्र किनारे बने एक बड़े से बंगले में गाने गाते हैं, फिर एक ढोंगी बाबा के पास जाते हैं जो ताकत बढ़ाने की दवाइयाँ बाँटता है, और इसके बाद फ़िल्म में एक बेहद घटिया और रंगभेद से भरा मज़ाक दिखाया जाता है.
फ़िल्म ‘द वान’ अपनी इस शुरुआती नाकामी से कभी उबर ही नहीं पाती. दर्शक भी इस अजीब और बेतुकी फ़िल्म से जुड़ नहीं पाते, जो फ़ैंटेसी और लोककथाओं का एक बेस्वाद मेल पेश करती है. कहानी में काले-घने जंगल हैं, उन जंगलों की रक्षा करने वाली देवियाँ हैं, और वे दुष्ट आत्माएँ हैं जो रात के अँधेरे में जंगल में कदम रखने वालों को निगल जाती हैं.
यह इंजीनियर अपनी पत्नी के साथ अपने गाँव पहुँचता है, जहाँ उसका बड़ा भाई (अनूप सोनी) और उसकी हमेशा चिढ़ी रहने वाली पत्नी (श्वेता तिवारी) रहते हैं. यहाँ आने का मकसद संपत्ति से जुड़े विवाद को सुलझाना है, और यह ज़मीन उसी डरावने और भूतिया जंगल के अंदर स्थित है.
गाँव का एक लालची इंसान (सुनील ग्रोवर) उस जंगल को हड़पना चाहता है. कोई भी समझदार इंसान देखकर ही बता सकता है कि यहाँ ज़मीन पर कब्ज़ा करने की साज़िश चल रही है. लेकिन न जाने क्यों, इस सब के बीच एक आइटम सॉन्ग घुसा दिया जाता है, जहाँ सिद्धार्थ और तमन्ना को डांस करने का मौका मिल जाता है.
तर्क में यकीन रखने वाला यह इंजीनियर गाँव के सभी रीति-रिवाजों और पुरानी परंपराओं का मज़ाक उड़ाता है. उसके घरवाले उम्मीद करते हैं कि उसे जल्द ही अक्ल आ जाएगी. लेकिन अगर ऐसा हो गया तो फ़िल्म आगे कैसे बढ़ेगी? इसलिए कहानी में नकली से दिखने वाले CGI मॉन्स्टर (राक्षस), दैवीय शक्ति वाले सींग वाले बैल और अलौकिक शक्तियों वाली देवियाँ एंट्री लेती हैं. फ़िल्म का बड़ा हिस्सा खूबसूरत पूजा की थालियों, लाल साड़ियों और बड़े-बड़े टीकों वाली औरतों को दिखाने में ज़ाया कर दिया जाता है. ये टीके नदी के पानी में डूबने के बाद भी नहीं छूटते! इसके बाद हीरो और विलेन के बीच नकली सी लड़ाई होती है, जिसमें इंसान और भली आत्माएँ मदद करती हैं.
सिद्धार्थ मल्होत्रा पूरी फ़िल्म में कभी तमन्ना को पानी में डूबने से बचाते हैं, तो कभी बर्फ़ीले पहाड़ों पर चढ़कर ‘बाहुबली’ के प्रभास की तरह धार्मिक प्रतीकों को अपने कंधों पर उठाकर नीचे लाते हैं. इस सब के बीच, एक ढँग की कहानी और लॉजिक फ़िल्म से पूरी तरह गायब हो जाते हैं.
कमजोरियां जो फिल्म का कबाड़ा करती हैं:
कंफ्यूज्ड राइटिंग: मेकर्स खुद तय नहीं कर पाए कि उन्हें पर्यावरण बचाना है, अंधविश्वास पर चोट करनी है या फिर अंधविश्वास को ही बढ़ावा देना है. फिल्म कभी तर्क की बात करती है तो अगले ही पल चमत्कार दिखाने लगती है.
बेवजह की कॉमेडी: मनीष पॉल का किरदार जबरदस्ती हंसाने के लिए रखा गया है, लेकिन उनके सीन इतने फीके हैं कि हंसी आने के बजाय चिढ़ मचती है.
कमजोर स्क्रीनप्ले: ‘आधे रास्ते में’ हीरो खुद कहता है कि “अभी मुझे कुछ समझ आ रहा है.” सच कहें तो दर्शक को भी पूरी फिल्म में बस ‘कुछ’ ही समझ आता है, बाकी सब बेसिर-पैर की बातें लगती हैं.
एक्टिंग की बर्बादी: सिद्धार्थ मल्होत्रा, तमन्ना भाटिया और सुनील ग्रोवर जैसे अच्छे कलाकारों की मेहनत खराब पटकथा (script) के नीचे दबकर रह गई है. किसी भी किरदार को ठीक से उभरने का मौका ही नहीं मिला.
निष्कर्ष
बिहार का बैकड्रॉप और छठ पूजा का माहौल भी इस कमजोर कहानी को डूबने से नहीं बचा पाता. फिल्म न तो आपको डरा पाती है, न ही हंसा पाती है और न ही कोई सीख दे पाती है.
कलाकार और उनके रोल
सिद्धार्थ मल्होत्रा (ऋषि): वह मुंबई में काम करने वाले इंजीनियर हैं जो बच्चे की चाहत में लगे हैं. पैसों की तंगी के कारण वह और उनकी पत्नी ममता (तमन्ना भाटिया) गांव आते हैं.
मनीष पॉल (वेद प्रकाश): वह ऋषि के दोस्त और व्लॉगर बने हैं. उनका काम फिल्म में कॉमेडी लाना था, लेकिन उनके सीन हंसाने के बजाय और परेशान करते हैं.
सुनील ग्रोवर (दीपक): वह गांव का एक व्यक्ति है जो जंगल कटवाकर वहां सड़क बनवाना चाहता है.
श्वेता तिवारी और अनूप सोनी: परिवार के पुराने विवादों और आपसी झगड़ों के किरदारों में नजर आते हैं.