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Home > विदेश > सऊदी अरब में आखिर क्या है ताजीर, जिसके तहत दी जा सकती है मौत की सजा? बांग्लादेशी कपल को सजा-ए-मौत पर बवाल!

सऊदी अरब में आखिर क्या है ताजीर, जिसके तहत दी जा सकती है मौत की सजा? बांग्लादेशी कपल को सजा-ए-मौत पर बवाल!

Saudi Arabia Bangladeshi Couple Death Penalty: सऊदी अरब की सरकारी न्यूज़ एजेंसी, सऊदी प्रेस एजेंसी ने गृह मंत्रालय के हवाले से कहा कि नज़रुल इस्लाम अब्दुल बशीर और सिती अख्तर ने मक्का की एक मस्जिद में अश्लील हरकतें कीं. इसके बाद सिक्योरिटी अधिकारियों ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया. जांच के बाद, उन्हें संबंधित कोर्ट में पेश किया गया. मिनिस्ट्री के मुताबिक, कोर्ट ने आरोप सही पाए और दोनों के खिलाफ फैसला सुनाया. इसके बाद उन्हें मौत की सज़ा सुनाई गई.

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Last Updated: October 21, 2026 10:12:59 IST

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Saudi Arabia Bangladeshi Couple Death Penalty: सऊदी अरब के मक्का की एक मस्जिद में अश्लील हरकतें करने के लिए एक बांग्लादेशी कपल को दी गई मौत की सज़ा विवादों में है. सऊदी गृह मंत्रालय के मुताबिक, नज़रुल इस्लाम अब्दुल बशीर और सिती अख्तर को कोर्ट ने दोषी ठहराते हुए मौत की सज़ा सुनाई है. इस बीच, जेद्दा में बांग्लादेशी कॉन्सुलेट ने कहा है कि उन्हें फांसी देने से पहले इस बारे में कोई जानकारी नहीं दी गई थी.सजा के कानूनी आधार पर गरमागरम बहस हो रही है. सऊदी अधिकारियों के एक बयान के मुताबिक, कपल को “ताज़ीर” के तहत मौत की सज़ा सुनाई गई. आइए जानें कि “ताज़ीर” क्या है, इस्लामिक कानून में इसका क्या मतलब है, और इसके तहत मौत की सज़ा कैसे दी जा सकती है.

पूरी कहानी क्या है?

सऊदी अरब की सरकारी न्यूज़ एजेंसी, सऊदी प्रेस एजेंसी ने गृह मंत्रालय के हवाले से कहा कि नज़रुल इस्लाम अब्दुल बशीर और सिती अख्तर ने मक्का की एक मस्जिद में अश्लील हरकतें कीं. इसके बाद सिक्योरिटी अधिकारियों ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया. जांच के बाद, उन्हें संबंधित कोर्ट में पेश किया गया. मिनिस्ट्री के मुताबिक, कोर्ट ने आरोप सही पाए और दोनों के खिलाफ फैसला सुनाया. इसके बाद उन्हें मौत की सज़ा सुनाई गई.

रिपोर्ट के मुताबिक, फैसले को संबंधित ज्यूडिशियल अथॉरिटी ने मंज़ूरी दे दी थी, और सज़ा को पूरा करने के लिए एक शाही हुक्म जारी किया गया था. हालांकि, सऊदी अधिकारियों ने पब्लिकली यह नहीं बताया है कि इस मामले में मौत की सज़ा किस खास कानूनी नियम के तहत दी गई थी. इस बीच, जेद्दा में बांग्लादेश कमर्शियल एम्बेसी ने कहा कि उसे सज़ा सुनाए जाने से पहले इसकी जानकारी नहीं दी गई थी. एम्बेसी ने सऊदी अधिकारियों से फॉर्मल कन्फर्मेशन मांगी है. इससे ज्यूडिशियल प्रोसेस और विदेशी नागरिकों को मौत की सज़ा देने के बारे में चर्चा शुरू हो गई है.

ताज़ीर क्या है?

इस्लामिक कानून के तहत, जुर्म और सज़ा को मोटे तौर पर तीन कैटेगरी में बांटा गया है: हद, क़िसास और ताजीर. इन तीनों के बीच का अंतर जुर्म के नेचर और उससे जुड़ी सज़ा तय करने के तरीके में है. ताजीर ​​एक ऐसी सज़ा है जिसके लिए इस्लामिक कानून में पहले से कोई तय सज़ा नहीं है. इसके तहत, एक जज जुर्म के नेचर, हालात और गंभीरता के आधार पर सज़ा तय कर सकता है.

एमनेस्टी इंटरनेशनल के अनुसार, ताज़ीर इस्लामिक कानून में सज़ा की एक कैटेगरी है, कोई अलग कानून नहीं. इसे उन अपराधों या कामों पर लागू किया जा सकता है जो तय सज़ा या बदले के न्याय की कैटेगरी में नहीं आते हैं. चेतावनी, जुर्माना और जेल जैसी सज़ाएँ दी जा सकती हैं. कुछ खास हालात में मौत की सज़ा भी दी जा सकती है. हालाँकि, इसका मतलब यह नहीं है कि ताज़ीर के तहत हर अपराध के लिए मौत की सज़ा हो सकती है. सज़ा का फ़ैसला संबंधित न्याय व्यवस्था और लागू कानूनी नियमों पर निर्भर करता है.

सऊदी अरब के न्याय व्यवस्था पर सवाल क्यों उठाए जाते हैं?

एमनेस्टी इंटरनेशनल के अनुसार, सऊदी अरब का न्याय व्यवस्था लंबे समय से शरिया के सिद्धांतों और जजों की व्याख्याओं पर बहुत ज़्यादा निर्भर रहा है. पारंपरिक रूप से, कोई ऐसा लिखा हुआ सज़ा का कानून नहीं रहा है जो सभी अपराधों और उनकी सज़ाओं को साफ़ तौर पर बताता हो. शरिया इस्लाम के धार्मिक सिद्धांतों पर आधारित है, जिसमें कुरान और सुन्नत का अहम रोल है. हालाँकि, किसी मामले में इन सिद्धांतों की व्याख्या और उन्हें कैसे लागू किया जाता है, इसमें जज की भूमिका अहम हो सकती है.

सऊदी अरब में लिखे हुए कानून मौजूद हैं. हालांकि, एमनेस्टी के मुताबिक, एंटी-टेररिज्म और साइबरक्राइम कानूनों में बड़े नियमों के इस्तेमाल को लेकर चिंताएं जताई गई हैं. इनमें पब्लिक ऑर्डर, धार्मिक मूल्यों और पब्लिक मोरैलिटी पर असर डालने वाले कामों से जुड़े नियम शामिल हैं. ताजिर एक्ट के तहत जजों को किसी जुर्म का नेचर और उसकी सज़ा तय करने का अधिकार भी इसी बहस का हिस्सा है. आलोचकों को चिंता है कि जुर्म और उनकी सज़ा के बीच साफ कानूनी सीमाएं न होने से फैसलों में अनिश्चितता बढ़ सकती है.

सऊदी अरब में मौत की सज़ा का रिकॉर्ड क्या है?

एमनेस्टी इंटरनेशनल के डेटा के मुताबिक, इस साल के पहले नौ महीनों में ही सऊदी अरब में 175 से ज़्यादा लोगों को मौत की सज़ा सुनाई गई, और अक्टूबर 2026 तक इतने लोगों को फांसी दिए जाने की उम्मीद है. डेटा से पता चलता है कि सऊदी अरब दुनिया में सबसे ज़्यादा फांसी देने वाले देशों में से एक है.

रिपोर्ट के मुताबिक, इस साल मौत की सज़ा पाने वालों में बड़ी संख्या में विदेशी नागरिक थे. इस दौरान, सऊदी अरब में 20 से ज़्यादा देशों के कम से कम 94 विदेशी नागरिकों को मौत की सज़ा सुनाई गई.

हाल के सालों में, सऊदी कोर्ट के कुछ फ़ैसले भी ख़बरों में रहे हैं. सोशल मीडिया पोस्ट के लिए कई दशकों तक की जेल की सज़ा की खबरें आई हैं. हालांकि, कुछ मामलों में, अपील के दौरान इन सज़ाओं को काफ़ी हद तक पलट दिया गया है.

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Saudi Arabia Bangladeshi Couple Death Penalty: सऊदी अरब के मक्का की एक मस्जिद में अश्लील हरकतें करने के लिए एक बांग्लादेशी कपल को दी गई मौत की सज़ा विवादों में है. सऊदी गृह मंत्रालय के मुताबिक, नज़रुल इस्लाम अब्दुल बशीर और सिती अख्तर को कोर्ट ने दोषी ठहराते हुए मौत की सज़ा सुनाई है. इस बीच, जेद्दा में बांग्लादेशी कॉन्सुलेट ने कहा है कि उन्हें फांसी देने से पहले इस बारे में कोई जानकारी नहीं दी गई थी.सजा के कानूनी आधार पर गरमागरम बहस हो रही है. सऊदी अधिकारियों के एक बयान के मुताबिक, कपल को “ताज़ीर” के तहत मौत की सज़ा सुनाई गई. आइए जानें कि “ताज़ीर” क्या है, इस्लामिक कानून में इसका क्या मतलब है, और इसके तहत मौत की सज़ा कैसे दी जा सकती है.

पूरी कहानी क्या है?

सऊदी अरब की सरकारी न्यूज़ एजेंसी, सऊदी प्रेस एजेंसी ने गृह मंत्रालय के हवाले से कहा कि नज़रुल इस्लाम अब्दुल बशीर और सिती अख्तर ने मक्का की एक मस्जिद में अश्लील हरकतें कीं. इसके बाद सिक्योरिटी अधिकारियों ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया. जांच के बाद, उन्हें संबंधित कोर्ट में पेश किया गया. मिनिस्ट्री के मुताबिक, कोर्ट ने आरोप सही पाए और दोनों के खिलाफ फैसला सुनाया. इसके बाद उन्हें मौत की सज़ा सुनाई गई.

रिपोर्ट के मुताबिक, फैसले को संबंधित ज्यूडिशियल अथॉरिटी ने मंज़ूरी दे दी थी, और सज़ा को पूरा करने के लिए एक शाही हुक्म जारी किया गया था. हालांकि, सऊदी अधिकारियों ने पब्लिकली यह नहीं बताया है कि इस मामले में मौत की सज़ा किस खास कानूनी नियम के तहत दी गई थी. इस बीच, जेद्दा में बांग्लादेश कमर्शियल एम्बेसी ने कहा कि उसे सज़ा सुनाए जाने से पहले इसकी जानकारी नहीं दी गई थी. एम्बेसी ने सऊदी अधिकारियों से फॉर्मल कन्फर्मेशन मांगी है. इससे ज्यूडिशियल प्रोसेस और विदेशी नागरिकों को मौत की सज़ा देने के बारे में चर्चा शुरू हो गई है.

ताज़ीर क्या है?

इस्लामिक कानून के तहत, जुर्म और सज़ा को मोटे तौर पर तीन कैटेगरी में बांटा गया है: हद, क़िसास और ताजीर. इन तीनों के बीच का अंतर जुर्म के नेचर और उससे जुड़ी सज़ा तय करने के तरीके में है. ताजीर ​​एक ऐसी सज़ा है जिसके लिए इस्लामिक कानून में पहले से कोई तय सज़ा नहीं है. इसके तहत, एक जज जुर्म के नेचर, हालात और गंभीरता के आधार पर सज़ा तय कर सकता है.

एमनेस्टी इंटरनेशनल के अनुसार, ताज़ीर इस्लामिक कानून में सज़ा की एक कैटेगरी है, कोई अलग कानून नहीं. इसे उन अपराधों या कामों पर लागू किया जा सकता है जो तय सज़ा या बदले के न्याय की कैटेगरी में नहीं आते हैं. चेतावनी, जुर्माना और जेल जैसी सज़ाएँ दी जा सकती हैं. कुछ खास हालात में मौत की सज़ा भी दी जा सकती है. हालाँकि, इसका मतलब यह नहीं है कि ताज़ीर के तहत हर अपराध के लिए मौत की सज़ा हो सकती है. सज़ा का फ़ैसला संबंधित न्याय व्यवस्था और लागू कानूनी नियमों पर निर्भर करता है.

सऊदी अरब के न्याय व्यवस्था पर सवाल क्यों उठाए जाते हैं?

एमनेस्टी इंटरनेशनल के अनुसार, सऊदी अरब का न्याय व्यवस्था लंबे समय से शरिया के सिद्धांतों और जजों की व्याख्याओं पर बहुत ज़्यादा निर्भर रहा है. पारंपरिक रूप से, कोई ऐसा लिखा हुआ सज़ा का कानून नहीं रहा है जो सभी अपराधों और उनकी सज़ाओं को साफ़ तौर पर बताता हो. शरिया इस्लाम के धार्मिक सिद्धांतों पर आधारित है, जिसमें कुरान और सुन्नत का अहम रोल है. हालाँकि, किसी मामले में इन सिद्धांतों की व्याख्या और उन्हें कैसे लागू किया जाता है, इसमें जज की भूमिका अहम हो सकती है.

सऊदी अरब में लिखे हुए कानून मौजूद हैं. हालांकि, एमनेस्टी के मुताबिक, एंटी-टेररिज्म और साइबरक्राइम कानूनों में बड़े नियमों के इस्तेमाल को लेकर चिंताएं जताई गई हैं. इनमें पब्लिक ऑर्डर, धार्मिक मूल्यों और पब्लिक मोरैलिटी पर असर डालने वाले कामों से जुड़े नियम शामिल हैं. ताजिर एक्ट के तहत जजों को किसी जुर्म का नेचर और उसकी सज़ा तय करने का अधिकार भी इसी बहस का हिस्सा है. आलोचकों को चिंता है कि जुर्म और उनकी सज़ा के बीच साफ कानूनी सीमाएं न होने से फैसलों में अनिश्चितता बढ़ सकती है.

सऊदी अरब में मौत की सज़ा का रिकॉर्ड क्या है?

एमनेस्टी इंटरनेशनल के डेटा के मुताबिक, इस साल के पहले नौ महीनों में ही सऊदी अरब में 175 से ज़्यादा लोगों को मौत की सज़ा सुनाई गई, और अक्टूबर 2026 तक इतने लोगों को फांसी दिए जाने की उम्मीद है. डेटा से पता चलता है कि सऊदी अरब दुनिया में सबसे ज़्यादा फांसी देने वाले देशों में से एक है.

रिपोर्ट के मुताबिक, इस साल मौत की सज़ा पाने वालों में बड़ी संख्या में विदेशी नागरिक थे. इस दौरान, सऊदी अरब में 20 से ज़्यादा देशों के कम से कम 94 विदेशी नागरिकों को मौत की सज़ा सुनाई गई.

हाल के सालों में, सऊदी कोर्ट के कुछ फ़ैसले भी ख़बरों में रहे हैं. सोशल मीडिया पोस्ट के लिए कई दशकों तक की जेल की सज़ा की खबरें आई हैं. हालांकि, कुछ मामलों में, अपील के दौरान इन सज़ाओं को काफ़ी हद तक पलट दिया गया है.

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