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Home > राज्य > बिहार > नीतीश कुमार का ‘नो’ या निशांत को CM बनाने का प्लान? ‘लव-कुश’ सम्मेलन रद्द होने से गरमाई बिहार की सियासत!

नीतीश कुमार का ‘नो’ या निशांत को CM बनाने का प्लान? ‘लव-कुश’ सम्मेलन रद्द होने से गरमाई बिहार की सियासत!

क्या नीतीश कुमार के बाद निशांत कुमार को CM बनाने की बिसात बिछ रही है? जानिए 'लव-कुश' सम्मेलन के अचानक रद्द होने की असली राजनीतिक वजह और बड़े दावे.

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Last Updated: September 1, 2026 16:25:03 IST

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‘लव-कुश प्रगतिशील ग्रुप बिहार’ द्वारा 30 अगस्त को पटना के बापू सभागार में आयोजित किया गया. हालांकि ‘लव-कुश जयंती सह सम्मान समारोह’ अचानक रद्द कर दिया गया. इस आयोजन की भव्य तैयारियां की जा रही थीं और प्रचार-प्रसार के लिए लगाए गए पोस्टरों से ऐसा लग रहा था मानो 1994 की ऐतिहासिक ‘कुर्मी चेतना रैली’ की तर्ज पर कोई बड़ा राजनीतिक प्रदर्शन होने वाला है. इस कार्यक्रम में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के शामिल होने की चर्चा थी. लेकिन ऐन मौके पर सिर्फ एक फेसबुक पोस्ट के जरिए कार्यक्रम रद्द होने की सूचना ने बिहार के राजनीतिक गलियारों में कई सवाल खड़े कर दिए हैं.

नारे, वादे और भव्य दावों का क्या हुआ?

समारोह को लेकर समाज को एकजुट करने, शक्ति प्रदर्शन करने और इतिहास रचने के बड़े-बड़े दावे किए गए थे. इसे केवल एक सांस्कृतिक कार्यक्रम न बताकर सामाजिक एकजुटता और स्वाभिमान का प्रतीक बताया जा रहा था. जब तैयारी इतने बड़े पैमाने पर थी, तो आखिर ऐसा क्या हुआ कि पूरे आयोजन को केवल एक सोशल मीडिया संदेश के माध्यम से खत्म कर देना पड़ा?

‘लव-कुश’ समीकरण को साधने की कोशिश

दरअसल, बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव में बीजेपी प्रत्याशी की हार के बाद एनडीए खेमे में हलचल बढ़ गई थी. माना जा रहा था कि इस हार के पीछे कुर्मी (‘लव’) समाज की नाराजगी भी एक बड़ी वजह थी. चूंकि नीतीश कुमार के ढाई दशक के लंबे राजनीतिक सफर में ‘लव-कुश’ (कुर्मी-कुशवाहा) समाज हमेशा उनका मुख्य आधार रहा है, इसलिए इस नाराजगी को दूर करना बेहद जरूरी समझा गया.

इस समारोह का मुख्य मकसद ‘लव-कुश’ समाज को फिर से एकजुट करना और मंच पर नीतीश कुमार व सम्राट चौधरी को एक साथ लाकर एक बड़ा राजनीतिक संदेश देना था. लेकिन ‘अपरिहार्य कारणों’ का हवाला देकर इसे टाल दिया गया.

नीतीश कुमार की दूरी और अंदरूनी खींचतान

राजनीतिक चर्चाओं की मानें तो मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इस कार्यक्रम में शामिल होने से साफ इनकार कर दिया था. इसके पीछे मुख्य रूप से दो वजहें सामने आ रही हैं:

  1. जातिगत सम्मेलनों से दूरी: नीतीश कुमार शुरू से ही सीधे तौर पर किसी एक जाति के सम्मेलनों में जाने से बचते रहे हैं. 1994 की प्रसिद्ध ‘कुर्मी चेतना रैली’ में भी वे समाज के भारी दबाव के बाद ही गए थे.
  2. नेतृत्व और उत्तराधिकार की चर्चा: कुर्मी समाज के एक बड़े तबके में अब नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार को अपने भावी नेता के रूप में देखने की इच्छा बढ़ रही है. समाज के लोग उनके नेतृत्व में बिहार का भविष्य तलाश रहे हैं.

राजनीतिक विश्लेषकों का क्या मानना है?

विश्लेषकों का स्पष्ट मानना है कि नीतीश कुमार किसी एक जाति या ‘लव-कुश’ के सीमित दायरे के नेता नहीं हैं. वे कुर्मी, धानुक, कुशवाहा, सवर्ण, पिछड़े, अति-पिछड़े और मुस्लिम- सभी वर्गों के सर्वमान्य नेता हैं. राष्ट्रीय स्तर के इतने बड़े नेता के लिए किसी एक जातिगत मंच पर जाकर अपनी छवि को सीमित करना सही फैसला नहीं होता.

यदि यह कार्यक्रम होता तो बिहार में ‘लव-कुश’ समाज के असली वारिस को लेकर नई बहस छिड़ जाती – क्या वह चेहरा सम्राट चौधरी हैं या निशांत कुमार? बांकीपुर उपचुनाव में परंपरागत वोट बैंक का दूर छिटकना यह दिखाता है कि जेडीयू को अपने आधार को दोबारा मजबूत करने की सख्त जरूरत है. 

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‘लव-कुश प्रगतिशील ग्रुप बिहार’ द्वारा 30 अगस्त को पटना के बापू सभागार में आयोजित किया गया. हालांकि ‘लव-कुश जयंती सह सम्मान समारोह’ अचानक रद्द कर दिया गया. इस आयोजन की भव्य तैयारियां की जा रही थीं और प्रचार-प्रसार के लिए लगाए गए पोस्टरों से ऐसा लग रहा था मानो 1994 की ऐतिहासिक ‘कुर्मी चेतना रैली’ की तर्ज पर कोई बड़ा राजनीतिक प्रदर्शन होने वाला है. इस कार्यक्रम में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के शामिल होने की चर्चा थी. लेकिन ऐन मौके पर सिर्फ एक फेसबुक पोस्ट के जरिए कार्यक्रम रद्द होने की सूचना ने बिहार के राजनीतिक गलियारों में कई सवाल खड़े कर दिए हैं.

नारे, वादे और भव्य दावों का क्या हुआ?

समारोह को लेकर समाज को एकजुट करने, शक्ति प्रदर्शन करने और इतिहास रचने के बड़े-बड़े दावे किए गए थे. इसे केवल एक सांस्कृतिक कार्यक्रम न बताकर सामाजिक एकजुटता और स्वाभिमान का प्रतीक बताया जा रहा था. जब तैयारी इतने बड़े पैमाने पर थी, तो आखिर ऐसा क्या हुआ कि पूरे आयोजन को केवल एक सोशल मीडिया संदेश के माध्यम से खत्म कर देना पड़ा?

‘लव-कुश’ समीकरण को साधने की कोशिश

दरअसल, बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव में बीजेपी प्रत्याशी की हार के बाद एनडीए खेमे में हलचल बढ़ गई थी. माना जा रहा था कि इस हार के पीछे कुर्मी (‘लव’) समाज की नाराजगी भी एक बड़ी वजह थी. चूंकि नीतीश कुमार के ढाई दशक के लंबे राजनीतिक सफर में ‘लव-कुश’ (कुर्मी-कुशवाहा) समाज हमेशा उनका मुख्य आधार रहा है, इसलिए इस नाराजगी को दूर करना बेहद जरूरी समझा गया.

इस समारोह का मुख्य मकसद ‘लव-कुश’ समाज को फिर से एकजुट करना और मंच पर नीतीश कुमार व सम्राट चौधरी को एक साथ लाकर एक बड़ा राजनीतिक संदेश देना था. लेकिन ‘अपरिहार्य कारणों’ का हवाला देकर इसे टाल दिया गया.

नीतीश कुमार की दूरी और अंदरूनी खींचतान

राजनीतिक चर्चाओं की मानें तो मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इस कार्यक्रम में शामिल होने से साफ इनकार कर दिया था. इसके पीछे मुख्य रूप से दो वजहें सामने आ रही हैं:

  1. जातिगत सम्मेलनों से दूरी: नीतीश कुमार शुरू से ही सीधे तौर पर किसी एक जाति के सम्मेलनों में जाने से बचते रहे हैं. 1994 की प्रसिद्ध ‘कुर्मी चेतना रैली’ में भी वे समाज के भारी दबाव के बाद ही गए थे.
  2. नेतृत्व और उत्तराधिकार की चर्चा: कुर्मी समाज के एक बड़े तबके में अब नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार को अपने भावी नेता के रूप में देखने की इच्छा बढ़ रही है. समाज के लोग उनके नेतृत्व में बिहार का भविष्य तलाश रहे हैं.

राजनीतिक विश्लेषकों का क्या मानना है?

विश्लेषकों का स्पष्ट मानना है कि नीतीश कुमार किसी एक जाति या ‘लव-कुश’ के सीमित दायरे के नेता नहीं हैं. वे कुर्मी, धानुक, कुशवाहा, सवर्ण, पिछड़े, अति-पिछड़े और मुस्लिम- सभी वर्गों के सर्वमान्य नेता हैं. राष्ट्रीय स्तर के इतने बड़े नेता के लिए किसी एक जातिगत मंच पर जाकर अपनी छवि को सीमित करना सही फैसला नहीं होता.

यदि यह कार्यक्रम होता तो बिहार में ‘लव-कुश’ समाज के असली वारिस को लेकर नई बहस छिड़ जाती – क्या वह चेहरा सम्राट चौधरी हैं या निशांत कुमार? बांकीपुर उपचुनाव में परंपरागत वोट बैंक का दूर छिटकना यह दिखाता है कि जेडीयू को अपने आधार को दोबारा मजबूत करने की सख्त जरूरत है. 

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